Tuesday, 29 July 2014

जब वे आम थे

जब वे आम थे हँसते थे, खिलखिलाते थे,
चाहे जिससे मिलते, चाहे जिससे बतियाते थे।
अब वे हो गये हैं खास, समाप्त हो चुकी है उनकी निजता-
और हो गया है उनकी हर बात का सरकारी करण।
प्रोटोकाल के चलते खुलकर हँसना, हर किसी से मिलना-
बतियाना बन गया है एक स्वप्न।
अब वे वही कर पाते हैं-
जो सरकारी अधिकारी चाहते हैं।
उस दिन वे चाहते थे अपने दिवंगत मित्र की-
शव यात्रा में सम्मलित होना।
अधिकारियों ने रोक दिया उनको वहाँ जाने से-
देकर सुरक्षा कारणों का हवाला।
उनके नाखुशी दिखाने पर, बनाया गया उनके वहाँ जाने का-
सरकारी कार्यक्रम।
सभी राजकीय तामझाम के साथ वे वहाँ जा पाए थे-
जब बीत चुके थे लगभग तीन माह, उनके मित्र को दिवंगत हुये।
वे स्वर्गवासी मित्र को अपने शब्दों में न दे पाये श्रदांजलि-
और उनके स्वजनों को सान्त्वना।
सरकारी तंत्र ने उनको पकड़ा दिया एक लिखित वक्तब्य।
उन्होंने कर दिया एक कुशल राजनेता की तरह-
उसका पाठन और उद्घाटन मित्र की स्मृति में होने वाले साप्ताहिक कार्यक्रमों का। 
जयन्ती प्रसाद शर्मा
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