Tuesday, 5 August 2014

सावन मन भावन आयौ

सावन मन भावन आयौ।

रुक रुक कर बहती पुरवाई,
अलसित कामिनी ले अँगड़ाई।
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे,
पिया मिलन को विरहन तरसे,
वैरी पपीहा आग लगावत-
पिहू पिहू कौ शोर मचायौ............................... सावन मनभावन.............।
कोयल कूक रही मतवाली,
फूल खिले हैं डाली डाली।
नाचत मोर मगन उपवन में,
उठत हिलोर हर्ष की मन में।
बरसे नेह रस अम्बर सौ-
सब जग में सरसायौ............................... सावन मनभावन.............।
दमक दमक कर दमके दामिन,
मेघ मल्हारें गावैं भामिन।
पड़ गये झूले अमवा की डाली,
झूला झूल रहीं मतवाली।
कर सोलह श्रंगार कामिनी-
सावन सगुन मनायौ............................... सावन मनभावन.............।
संग सहेली झूला झूलें विरहन के मन उठती हूलें।
कभी अन्दर कभी बाहर आवै,
पर साजन बिन चैन न पावै।
खिल गई कुंद-कली सी सजनी,
जब मनभावन साजन आयौ............................... सावन मनभावन.............। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा 
चित्र गूगल से साभार       
     
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