Friday, 20 March 2015

कुहरा

वातावरण में फैला घना कुहरा-
लगता है मनुष्य के अन्तस में भी छा गया है।
पास खड़े स्वजनों के चेहरे भी उसे-
दिखाई देते हैं काले धब्बे से।
असहनीय शीत से उसकी जड़ हो गई है-
भावना, संचेतना।
अपनों की भावों की गर्माहट भी-
नहीं कर पाती है कोई स्पंदन।
प्रतीक्षा है किसी बासंतिक बयार के झोंके की,
एक टुकड़ा गुनगुनी धुप की,
जो छांट देगी पसरे कुहासे को-
तन की सर्द जड़ता को।
वह देख सकेगा ठीक से हर आकृति,
अनुभव कर सकेगा हर मन की भावना की-
उष्णता।
जयन्ती प्रसाद शर्मा
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