Monday, 20 April 2015

भली करी जो तुम आये

भली करी जो तुम आये।
ज्येष्ठ मास की तप्त दुपहरी सा जीवन,
नही शीतलता का लेश, दग्ध हुआ तन और मन।
भावों की सरिता सूख गई है,
कल्पना शीलता रूठ गई है।
उष्ण प्रदेश से मेरे जीवन में बरखा बहार तुम लाये.......भली करी.......।
मेरा नीरस जीवन सरस बनाया,
मेरे सूखे मन उपवन को हरित बनाया। 
अपने सघन केश की छाया कर,
भीषण गर्मी से त्राण दिलाया।
किया सुवासित अपनी सांसों से, भाव मेरे महकाये........भली करी......।
चुस्त चीकनी मेरी खुरदरी खाल हो गई,
लड़खड़ाहट हो गई दूर सरपट चाल हो गई।
शुष्क कंठ से नही फूटता था कोई स्वर,
घुटी घुटी सी मेरी वाणी वाचाल हो गई।
अब तो उत्फुल्लित मन मेरा हर दम प्रेम तराना गाये.....भली करी......।
है यही कामना तुम बनी रहो मेरे जीवन में,
कोई प्रेम प्रसून खिलादो मेरे आँगन में।
वह होगा प्राणाधार हमारा-
बाँधेगा हम दोनों को प्यारे बंधन में।
अतिसुखदायक होगा वह पल अंकबद्ध कर उसको, जब तू लोरी गाये.......भली करी........। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा

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