Tuesday, 7 April 2015

भीषण ताप से संतप्त मन को

भीषण ताप से संतप्त मन को मिली शान्ति,
फैला दिये जब तुमने अपने सघन केश। 
लगा जैसे घिर आई हो काली बदली-
घटाने को सूर्य की तेजस्विता। 
गर्मी से बेहाल मन को अनुभव हुआ सितलाई का। 
तुम्हारे मुख पर उभरे स्वेद कर्ण,
झलक रहे थे मोती से–
और बहता हुआ स्वेद लग रहा था जल धारा सा। 
उसके स्पर्श से शीतल हुए वायु के हलके झौंको से-
दूर हो गई मन की तपिश। 
उनमे घुली तुम्हारे बदन की गंध-
छा गई अंतस में।
तुम्हारी सांसों की महक से गमक उठा परिवेश। 
लगा सद्द विकसित कलियों की सुगन्ध-
फैल गई हो मन उपवन में। 
कामना है ऐसे ही फैला कर अपने केश–
देती रहो मुझे हर दुख के ताप से त्राण।
अपने स्वेद से सिक्त आकर कराती रहो शीतलता का अहसास-
और अपनी सांसों से महकाती रहो मन उपवन। 
तुम्हारे साथ रहने के अहसास से 
मै भुला दूंगा जीवन की हर कड़वाहट व दुखों की उत्तप्ता। 
जयन्ती प्रसाद शर्मा

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