Monday, 9 November 2015

सामयिकी

राजनीति के अपने हैं तौर,
अपने ही ढंग है। 
कल तक थे वे उनके साथ,
आज इनके संग हैं। 
जो मर्मान्तक शब्दों के चला रहे थे तीर,
जो कर देते थे मन को अधीर। 
देख पलट कर तो वो निकले,
जो कल तक थे इनके बगलगीर। 
नहीं नेताओं को अपना मानो,
गिरगिट की सी गति इनकी जानो। 
नहीं इनकी बातों में आओ,
इनकी फितरत को पहचानो। 
जिनके बोल बचन कारक हैं संताप के,
जलते अंगारों के उन्ताप से। 
रहना संभल कर और सजग,
अब वे हो गये हैं आपके। 
आम बन गये हैं खास,
खास हो गये हैं उदास। 
मिलते मिलते मंजिल रह गई,
व्यर्थ हुये सारे प्रयास। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा              
    
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