Friday, 26 February 2016

प्रवर बन्धु नमस्ते!

प्रवर बन्धु नमस्ते!
नहीं विसूरते देखा तुमको,
रहते हरदम हँसते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
नहीं दुखी करते क्या दुख तुमको,
शूल नहीं सालते क्या मन को।
कैसे सह लेते तन मन की पीड़ा,
इसका राज बताओ हमको।
दारुण दुख में भी नयन तुम्हारे,
देखे नहीं बरसते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
मैं नहीं पालता खुशफहमी,
मैं यथार्थ में जीता हूँ।
नहीं करता कोई कल्पना-
जहर को जहर समझकर पीता हूँ।
सुख-दुख नहीं करते उद्धेलित मुझको,
सहता हूँ समान समझते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
सुख औरों के नहीं करते-
मुझको दुखी
दुख औरों के नहीं करते-
मुझको सुखी।
मैं दायित्व निभाता हूँ-
मन से और हरषते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
मैं नहीं सोचता भूत भविष्य की-
वर्तमान में रहता हूँ।
मैं नहीं सहेजता वर्षों को,
पलों की चिन्ता करता हूँ।
बनते दिन, महीने और साल पलों से,
भविष्य के खुल जाते हैं रस्ते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।


जयन्ती प्रसाद शर्मा                   
Post a Comment