Thursday, 6 November 2014

न कुछ तुम कहो न कुछ हम कहें

न कुछ तुम कहो न कुछ हम कहें-
बस यूँ ही चलते रहें।
ये दूरियां मिट जायेंगी, मंजिले मिल जायेंगी,
खामोशियाँ तेरी मेरी दिल की जुबाँ बन जायेंगी।
दिल की सदा पहुंचेंगी दिल तक-
आँखों से बातें हम करें.............. न कुछ तुम कहो...................।
दिलरूंबा माहेजबीं मुझसे तुम रूठों नहीं,
मेरे दिल से करके दिल्लगी तुम मजे लूटो नही।
बे मौत मर जायेंगे हम-
नही बेरुखी हम से करें.............. न कुछ तुम कहो...................।
आशिकों की भीड़ होगी, हम सा ना कोई पाओगी,
मर गये जो हम सनम, तुम बहुत पछताओगी।
न जिगर पर खंजर चला-
हम ये इल्तजा तुम से करें.............. न कुछ तुम कहो...................।
जुल्म तू हम पर किये जा, हम बफा निभायेंगे,
तेरे दिये जख्मों को लेकर इस जहाँ से जायेंगे।
तुमको न हम रुसवा करेंगे-
यह वायदा तुमसे करें.............. न कुछ तुम कहो...................।
जयन्ती प्रसाद शर्मा
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