Friday, 23 December 2016

मेरे दिल की लगी आग को

मेरे दिल की लगी आग को आंचल से हवा दे दी,
बीमार विस्मिल यार को मरने की दवा दे दी।
             तुम्हारे तंग दिली का नहीं था पता,
             हम मर मिटे नजरें मिलाने पर।
             सलीव पर लटका दिया दिल अपना,
             तुम्हारे मुस्कराने पर।
तुम संग कर मुहब्बत हमने,
अपने दिल को सजा दे दी.................. मेरे दिल...............।
             मामूल पर थी जिंदगी,
             नहीं कोई झमेला था।
             था जिंदगी में अमन चैन,
             खुशियों का मेला था।
तुम्हारी देख कर सूरत,
मेरे दिल ने दगा दे दी.................. मेरे दिल...............।
             हम जुल्म अपने आप पर करते रहे,
             तुम्हारी बेरुखी से रोज जीते रहे मरते रहे।
             उम्मीदों का जला कर दिया,
             रोशन दिल अपना करते रहे।
किया तुम पर भरोसा,
बस यही थी खता मेरी.................. मेरे दिल...............।
             हमें तुमसे मुहब्बत है नहीं इन्कार करते हैं,
             तुमसे इश्क का इजहार हम सौ बार करते हैं।
             हम प्यार करने वाले नहीं,
             अंजाम की परवाह करते हैं।
हँसते हुये सह लूँगा यह दुनियाँ,
जो भी सजा देगी.................. मेरे दिल...............।

जयन्ती प्रसाद शर्मा                           

Friday, 9 December 2016

ऐसे कैसे तुम जाओगे

ऐसे कैसे तुम जाओगे!
नहीं हुआ अभी तक कुशल क्षेम,
नहीं हुई कोई बात। 
नहीं कही अपनी नहीं सुनी हमारी,
दुख के कैसे झेले झंझावत।
बिना कहे मन की पीड़ा को,
ऐसे ही ले जाओगे..................ऐसे कैसे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ।
कहते हैं कहने सुनने से,
दुख कम हो जाते हैं।
जीने का हौसला बढ़ जाता है,
गम बेदम हो जाते हैं।
अपनी ब्यथा कथा का सहभागी,
हमको नही बनाओगे..................ऐसे कैसे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ।
माना कोई कुछ कर नही सकता है,
दुख के क्षण कम कर नही सकता है।
दुखियों की सान्त्वना को,
कुछ कह तो सकता है।
दुख में है सब साथ तुम्हारे,
इस अहसास से संबल तुम पा जाओगे.........ऐसे कैसे,,,,,,,,।  
मत चुप बैठो कुछ तो बोलो,
बनो नही घुन्ना ग्रन्थि मन की खोलो।
बिखरा दो संचित दुख को,
कष्टों के मार से हल्के हो लो।
हल्के हो कर उड़ों गगन में,
पार दुखों से पा जाओगे..................ऐसे कैसे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा         

Thursday, 24 November 2016

पथिक

पथिक तुम कौन देश से आये।
रहे घूमते यों  ही निष्फल–
या कोई मंजिल पाये..........................................पथिक ..... ।
           ठहरो पलभर लो विश्राम ,
           थकित पगों को दो विराम।
           कहो हमें मन्तव्य तुम्हारा ,
           बतलाओ गन्तव्य तुम्हारा 
भूल गये तुम अपनी मंजिल या पथ विसराये........पथिक ..... ।
           हो अवधूत या तुम यायावर,
           अथवा किसी देश के गुप्तचर।
           बने हुये हो तुम घुमन्तु,
           किसी धर्म प्रचार में हो कर तत्पर।
शान्ति दूत हो किसी देश के सद्दभावना मिशन पर आये.......पथिक ...।  
           दूत नहीं अवधूत नहीं,
           नहीं यायावर नहीं गुप्तचर।
           मैं हूँ वासी  इसी देश का,
           निःसंदेह हे बंधु प्रवर।
देख दुर्दशा प्यारे भारत की घूम रहा अकुलाये........पथिक ..... ।
           राजनीति में हो गई अनीति,
           घुस बैठा परिवार वाद ।
           बढ़ गया भ्रष्टाचार देश में,
           फल-फूल रहा आतंकवाद ।
कोई आये इन भूले-भटकों को कर्तव्यों का बोध कराये........पथिक ..... ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Friday, 11 November 2016

सरकारी उलटबांसी

सरकारी आदेशानुसार,
मुखिया के तौर पर लिखा जायेगा धनियाँ का नाम।
अब धनियाँ होगी शीर्ष पर और रामू खिसक कर,
नीचे आ जायेगा।
मैं नहीं समझता इससे कुछ फर्क पड़ेगा,
रामू चाहे ऊपर रहे या नीचे।
राशन की लाइन में लगने को रामू तो जाने से रहा, 
जायेगी धनियाँ ही।
चाकू ऊपर रहे या नीचे-
कटेगा खरबूजा ही।

जयन्ती प्रसाद शर्मा        

Friday, 4 November 2016

मेरे दिल में बहुत दर्द है

मेरे दिल में बहुत दर्द है!
            यह दर्द है लोगों के मानवता भुलाने का,
            नहीं दुख में किसी के काम आने का।
            अपनी स्वार्थ परता के लिये नहीं लाना खयाल,
            किसी के दिल ना दुखाने का। 
मुझे लगती है ठेस उनसे,
जो इंसानियत का भुलाये बैठे फर्ज हैं.............. मेरे दिल में........।
            वरिष्ठों का सम्मान जो करते नहीं,
            माँ-बाप के अपमान से डरते नहीं। 
            मातृ शक्ति को जो कर देते हैं शर्मसार,
            उससे दुष्कर्म करने में शर्म करते नहीं। 
जिनके मातृत्व पितृत्व पर हो रहे विवाद,
उनके संतति संस्कृति का बड़ा ही करती हर्ज है.....मेरे दिल में.........।
            लोग शहीदों की शहादत विसराये बैठे हैं,
            गाँधी, नेहरु, सुभाष, भगत सिंह को भुलाये बैठे हैं। 
            देश में उच्च पदस्थ लोग,
            लूटने खसोटने की आदत बनाये बैठे हैं। 
बढ़ गया भ्रष्टाचार देश में,
कर रहे कर्णधार ही बेड़ा गर्क हैं.............. मेरे दिल में.................।
            ‘हम आजाद हैं’ की उन्मुक्तता में लोग मनमानी कर रहे हैं,
             रख ‘ला एंड आर्डर’ जेब में राहजनी, चोरी, छिनैती कर रहे हैं।
             बाह्य व आंतरिक अतिवादी,
             जनमानस को त्रस्त कर रहे हैं।
अपना ही रक्त भ्रष्टाचारी अति-वादियों का,
बना हुआ हमदर्द है.............. मेरे दिल में...................।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Sunday, 23 October 2016

जड़ों की औकात

अपनी सघनता और विशालता से इतराये वट वृक्ष ने
देखते हुये नफरत से
उतार दी अपनी कुछ लटें भूमि में
जानने को जड़ों की औकात
वहाँ फैला था उसकी ही जड़ों का जाल
उसी की सघनता सा विशाल क्षेत्र में
वे जड़ें तो थीं पर थीं पूर्ण चैतन्य
वे जकड़ी हुई थीं भूमि से और
कर रही थीं प्रदान सम्बल उस वृक्ष को
सोख कर भूमि से पोषक तत्व
पहुँचा रहीं थी ऊर्ध्व भाग को
बनाये रखने को उसे हरा-भरा
वे लटें भी बन गई थीं जड़ें
गहरे समा गई थीं भूमि में
वे भी खींच कर जमीन से नमी व पोषक तत्व
पहुँचा रहीं थीं अपने बाह्य भाग को
जो बन गये थे स्वतंत्र वृक्ष
पता नहीं उस वृक्ष को
अभी भी नहीं समझ आयी थी जड़ों की औकात

जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Friday, 7 October 2016

गंजे को नख मत दे भगवान

गंजे को नख मत दे भगवान,
खोंटते खोंटते सिर, अपना हो जायेगा लहू लुहान।
       उद्दमहीन अनायास जब,
       कुछ पा जाते हैं।
       नहीं सोच पाते हें सदुपयोग,
       सिर अपना खुजलाते हैं।
खुजलाते खुजलाते सिर अपना,
हो जाते हैं हैरान................... गंजे को............ ।
        करके ही अपने सिर की नोंच खसोट,
        कचोट अडौस-पड़ौस में करते हैं।
        करने लगते हैं तंग समाज को,
        नहीं तनिक भी डरते हैं।
दुःखदायी हो जाते हैं,
गिरे पड़े जब पा जाते हैं अधिमान............ गंजे को.....।
         जो सत्ता में आ जाते हैं हनक से उसकी,
         पगला जाते हैं।
         लगते हैं लूटने सम्पत्ति देश की,
         अपने घर लाते हैं।
भूलकर देश और समाज की सेवा,
हो जाते हैं बे-ईमान................... गंजे को............ ।
          राजनीति में आकर भूखे,
          अफरा जाते हैं।
          पी जाते हैं तेल देश का,
          चारा भैंसों का खा जाते हैं।
कल के महान छील रहे आलू जेल में,
समय बड़ा बलवान................... गंजे को............ । 

जयन्ती प्रसाद शर्मा   

Friday, 30 September 2016

अफसाना शेख चिल्ली का

याद आता है अफसाना,
शेख चिल्ली का। 
खम्बा नौंचना, 
खिसियाई बिल्ली का। 
नतीजा अपनी पिछली, 
हिमाकत का देख।
पूर्व (ना) पाक है अब,
सोनार बांग्लादेश। 
ना डाल नापाक नजर,
कश्मीर-जम्मू में। 
टूटेगा गरूर जलेगा घर, 
लगेगी आग तम्बू में। 
देते हैं हिदायत, 
जा चीन या बिलायत। 
लेना पड़ेगा सहारा तुझे, 
सदा नई दिल्ली का। 
याद आता है अफसाना,
शेख चिल्ली का। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Friday, 23 September 2016

वे शायर बड़े मशहूर थे

वे शायर बड़े मशहूर थे,
पर बहुत मगरूर थे।
थे इंसानियत के पक्षधर,
मगर उससे बहुत ही दूर थे।
एक दिन बैठे थे ऊबे हुये,
कुछ नशे में डूबे हुये।
अचानक जाग उठी उनकी संवेदना,
करने लगे आंगन में खड़े कुत्ते की अभ्यर्थना।
किये स्पर्श उसके चरण,
पिताजी आपके बिना मेरा था मरण।
आपके पुण्य प्रताप से-
मेरा उदभव हो सका है।
कुछ अधिक ही उनको सुरूर चढ़ गया था,
पास बैठे पिता को देखकर-
उनका मूड उखड गया था।
बोले, ‘ कुत्ते अपनी औकात भुला बैठा है’ ,
जो इस तरह सहन में आ बैठा है।
उन्होंने पकड़ा उनका हाथ,
खींच कर ले चले अपने साथ।
बाहर टंगे कुत्ते के पट्टे को,
उनके गले में डाल दिया-
और एक सूखी रोटी का टुकड़ा-
उनके आगे डाल दिया।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Tuesday, 13 September 2016

हिन्दी दिवस

आओ हिन्दी दिवस मनायें,
हिन्दी का वर्चस्व बढायें। 
हिन्दी में है माधुर्य,
हिन्दी में लालित्य। 
हिन्दी में ग्रंथों की मीमांसा,
उसमे विपुल साहित्य। 
चाहे तेलगू हो चाहे हो कन्नड़,
चाहे मलयालम भाषी।
चाहे हो बंगाली या पंजाबी,
सबको है हिन्दी आती।
संस्कृत है भाषाओँ की जननी, 
सब भाषाओँ में बह्नाता है।
सब भाषाओँ में है समन्वय,
सब ने ही अपनाया है।
सबने स्वीकारी हिन्दी,
विश्व भाषाओँ में स्थान दिया।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी हिन्दी को,
अधिकारिक भाषा का मान दिया।
विश्व हिन्दी दिवस की बेला पर,
चारण बन जाऊँगा।
हिन्दी का यशगान करूँगा,
हिन्दी के गुण गाऊंगा।
आओ हम सब जय घोष करें,
जय हिन्दी जय हिन्दुस्तान।
हिन्दी जग में हो प्रतिष्ठित,
विश्व नेतृत्व करे भारत महान।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

चित्र गूगल से साभार  


Thursday, 8 September 2016

तुम्हें देखना है

सुकवि कोई पहचाना नहीं जाये-
कोई बात नहीं,
चारण का अभिनन्दन हो नहीं जाये-
तुम्हें देखना है।

साधु कोई पूजा नहीं जाये-
कोई बात नहीं,
असाधु का वंदन हो न जाये-
तुम्हें देखना है।

संतों का समागम हो नहीं पाये-
कोई बात नहीं,
दुष्टों का गठबंधन हो नहीं जाये-  
तुम्हें देखना है।

देश भक्त सराहा नहीं जाये- 
कोई बात नहीं,
देशद्रोह को चन्दन लग नहीं जाये-
तुम्हें देखना है।

जयन्ती प्रसाद शर्मा    

Saturday, 27 August 2016

वह एकाक्षी था

जो कार्यकर्ता रखता हो समभाव,
देखता हो सबको एक नजर से,
आगामी विधानसभा चुनाव के लिये-
वह होगा दल का प्रत्याशी। 
एक कार्यकर्ता जो पहने था काला चश्मा-
खड़ा हो गया। 
बोला, “ इस अर्हता का मैं एक मात्र प्रत्याशी हूँ। 
छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, दोस्त और दुश्मन-
सबको एक ही नजर से देखता हूँ। 
श्रीमान न हो विश्वास करलें पुष्टि,
यह कहकर उसने अपना चश्मा उतार दिया। 
लोगों ने देखा वह एकाक्षी था। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा              

Saturday, 23 July 2016

आशावाद

ओ रवि आज तुम्हें ढक दिया है कुहासे ने 
दे दी है चुनौती तुम्हें गलाने की 
तुम्हारा अस्तित्व मिटाने की 
वह भूल गया है वे दिन 
जब तुमने अपनी तपिश से 
कर दिया था उसे समाप्त प्रायः 
आज तुम पुनः करा दो अहसास 
अपने शक्तिमान होने का 
कितना भी घना हो कुहरा 
छट जायेगा 
नष्ट कर उसका घनत्व 
सूरज निकल आयेगा 
ओ कवि तू भी दिखा दे अपनी सामर्थ्य 
अपनी सशक्त रचनाओं से
सिखा देगा भूले भटकों को 
मानवता से प्रेम 
दूर हो जायेगी उनकी कुंठा 
और विश्व से मिट जायेगा आतंकवाद 
सदा के लिये 

जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Friday, 8 July 2016

मानवती तुम आ जाओ

 मानवती तुम आ जाओ!
            तुम रुँठी सपने रूठे,
            कर्म–भाग्य मेरे फूटे।
            बिखर गया मेरा जीवन,
            मन माला के मनके टूटे।
टूटे मनके पिरो पिरो कर,
सुन्दर हार बना जाओ      ...........मानवती तुम  .......... ।
            भावों की लड़ियाँ टूट गयी हैं,
            उपमायें मुझसे रुँठ गयी हैं।
            उलझ गया है शब्दजाल,
            गीतों की कड़ियाँ छूट गयी हैं।
छूटी कड़ियों को मिला मिलूँ कर,
सुन्दर गीत बना जाओ       .........मानवती तुम ............ ।
            नहीं किसी अभिनन्दन की चाह मुझको,
            नहीं किसी के कुछ कहने की परवाह मुझको।
            मेरा अभीष्ट तेरा वन्दन,
            तुमको पाने की चाह मुझको।
दर्शन के प्यासे नैनों की,
आकर प्यास बुझा जाओ         ..........मानवती तुम .............. ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Sunday, 26 June 2016

पापी पेट का सवाल है

पापी पेट का सवाल है पापी पेट का सवाल है।
        न होता अगर पेट पापी,
        न मांगती भीख सोना
        न काटता जेब पप्पू,
        न नाचती महफिल में मोना।
पेट की खातिर बन गया भीखू,
कोठे का दलाल........................... पापी पेट का........... ।
        पापी पेट की आग से, 
        पशु पक्षी भी जल रहे हैं।
        तोता, मैना, बन्दर, भालू 
        सर्कस में खेल कर रहे हैं।
भूखे पेट शेर और हाथी,
दिखा रहे रिंग में कमाल................ पापी पेट का........... । 
        भूखे आकर राजनीति में,
        खूब खाते हैं ।
        फिर भी नहीं अफरते,
        पेट इनके बढ़ते जाते हैं।
कोई उठा देता है ऊँगली,
करवा देते हैं बवाल...................... पापी पेट का........... । 
        कुछ खा गये भैंसों का चारा,
        कुछ ने डकारे तेल में।
        कुछ ने दिखाई कला बाजियां,
        खा गये अरबों खेल में । 
नहीं शरमाते भ्रष्टाचारी,
उनको नहीं होता मलाल................ पापी पेट का........... । 

जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Tuesday, 7 June 2016

चिलचिलाती दुपहरी में

चिलचिलाती दुपहरी में,
आग बरसाती तिजहरी में।
मैं झूम-झूम जाता था-
क्योंकि वह मेरे साथ थी।
                    खार फूल लगते थे,
                    नजारे अनुकूल लगते थे।
                    मैं हँसता था मुस्कराता था,
                    क्योंकि उस मिलन की अलग बात थी।
चन्दा की चाँदनी,
लगती थी सुहावनी।
हम नाँचते थे गाते थे-
क्योंकि वस्ल की वह रात थी।
                     कुछ बात ऐसी हो गई,
                     वह मुझसे दूर हो गई।
                     बदल गये नजरिया नजारे-
                     क्योंकि वह बेबफा नहीं पास थी।

जयन्ती प्रसाद शर्मा          

Wednesday, 25 May 2016

कहाँ गये मन के कोमल भाव

कहाँ गये मन के कोमल भाव!
वृद्धावस्था जानकर मेरी,  
शायद करते हैं मुझसे दुराव.................. कहाँ गये...।
           मैं अब भी दुखियों के मन को, 
           अच्छी बातों से बहलाता हूँ।
           उनके टीसते घावों को,
           अपने हाथों से सहलाता हूँ।
पर लगता है कर रहा हूँ अभिनय,
नहीं मन से हो पाता जुड़ाव .................. कहाँ गये...।
          बच्चों की खिलखिलाहट भरी हँसी,
           नहीं मन की कली खिलाती है।
           मेरे मन की कुंठा मेरे,
           भावों पर हावी हो जाती है।
बहुतेरा मन समझाता हूँ,
पर नहीं हटता उसका प्रभाव  .................. कहाँ गये...।
           नहीं नैसर्गिक सुषमा से,
           मन मेरा हरषाता है।
           सुन्दर नारी के दर्शन से,
           नहीं तन पुलकित हो पाता है।
दिल में नहीं होती है हलचल,
नहीं प्रेम रस का होता रिसाव.................. कहाँ गये...।
           काश ऐसा कुछ हो जाये,
           ह्रदय उल्हास से भर जाये।
           जाग उठे मन में उमंग,
           दूर निराशा हो जाये।
आजायें मन में भावों की बाढ़,
बढ़ जाये नेह रस का बहाव .................. कहाँ गये...।

जयन्ती प्रसाद शर्मा                     

Friday, 13 May 2016

आओ दुख मेरे जीवन में आओ

आओ दुख मेरे जीवन में आओ,
तुम व्यापो मुझको नहीं दया दिखलाओ।
बड़े सुहाने होते हैं सुख के क्षण,
तपिश दूर करते हैं तत्क्षण।
हर लेते हैं तन मन की पीड़ा-
शुष्क हो जाते हैं मन के ब्रण।
पर पल भर को देते हैं साथ, तुम चिर साथी बन जाओ.......आओ............।
मैं अपने सुख के लमहों में भूल गया औरों का गम,
देख अश्रु किन्हीं आँखों में नहीं हुई ये आँखें नम।
नहीं फूटे सांत्वना के सुर मुख से-
संवेदना हो गई है कम।
तुम टीसो मेरे घाव नहीं सहलाओ.......आओ...........।
नहीं बुहारो पथ ऐसे ही जाने दो,
नहीं बिछाओ फूल पांव में कांटे चुभ जाने दो।
जो नहीं कर सके कोई घर रोशन-
ऐसे दीपों को बुझ जाने दो।
दुखिओं के संग रो लेने दो नहीं चुपाओ.......आओ............ ।
सुख में जो घेरे रहते हैं भाग वे दुख में जाते हैं
सच्चे शुभचिंतक ही दुःख में साथ निभाते हैं।
दुख के बाद ही आते हैं सुख के पल-
लोग पता नहीं दुख से क्यों घबराते हैं।
दुखों का स्वागत करो, नहीं डराओ.......आओ........... ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा .                      

Tuesday, 5 April 2016

नहीं छेड़ा तुमने कोई तराना

नहीं छेड़ा तुमने कोई तराना मेरे आने पै,
लगता है फर्क नहीं पड़ता है तुमको, मेरे नहीं आने पै।
मैं घुसता चला गया प्रकोष्ठ में,
चुम्बन जड़ दीना तुम्हारे ओष्ठ में।
तान दुपट्टा तुम सोई थीं,
शायद सपनों में खोई थीं।
पड़ी रहीं अलसाती, नहीं जागी तुम मेरे जगाने पै..... लगता है...............।
बाँहों में तुमको लीना,
अंकबद्ध तुमको कीना।
मुंदित नयन तुम पड़ी रहीं,
प्रस्तर प्रतिमा सी बनी रहीं।
नयनोन्मीलन कीना, पर नहीं झपकायी पलकें मेरे नयन मिलाने पै..... लगता है...............।
अति उत्साहित था मेरा मन,
नजरों में बसा था तेरा तन।
नहीं सब्र था पलभर मुझको,
स्पर्श किया उद्धेलित हो तुमको।
सहलाया मैंने बड़े प्रेम से, पर नहीं आई तुम्हें झुरझुरी मेरे सहलाने पै..... लगता है...............।
लेकर नाम पुकारा हमने,
सुनी अनसुनी कर दी तुमने।
बहुत क्रोध मुझको आया,
मैं मन मार चला आया।
प्रश्न कचोटता रहा रातभर, क्यों नहीं आई तुम मेरे बुलाने पै..... लगता है...............।


जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Thursday, 24 March 2016

बाज रहे ढोल ढप

बाज रहे ढोल ढप,
बाज रही चंग।
खेल रहे होरी श्याम,
राधा जी के संग।
              संग लिये ग्वाल बाल,
              आये नंदलाल।
              अंटी में रंग लाये,
              मुटठी में गुलाल।
              मन में नेह भरौ,
              अंखियन में उमंग............... खेल रहे............. ।
कान्हा के मन उठी उचंग,
राधिका पै डारौ रंग।
सात रंग कौ लहँगा भीजौ
चूनर भीगी पचरंग।
पिचकारी की सम्मुख फुहार से,
चोली भई तंग............... खेल रहे............. ।
              नाँच रहे ग्वाल-बाल,
              गोपिन को रिझाई रहे
              कर रहे खींच तान-
              और शोर मचाय रहे।
              ग्वालिनों पर रंग डार,
              कर रहे हुरदंग............... खेल रहे............. ।
गोपियों ने घेरे श्याम,
रंग दियौ तन तमाम।
बेकार सब रंग गये,
श्याम श्याम ही रहे।
उनके कारे अंग पै,
चढ़ौ न कोई रंग............... खेल रहे............. ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 


चित्र गूगल से साभार 


Tuesday, 22 March 2016

होली मिलने मिलाने का त्योहार है

होली मिलने मिलाने का त्योहार है,
हिल मिल कर मनाइये।
अपनों को ठुकराकर,
औरों को अपनाकर-
नहीं दिल उनका जलाइये...... होली मिलने......... ।

होली की धूम में,
मचता है हुरदंग।
उड़ते हैं अबीर गुलाल,
बरसते हैं रंग।
भंग में रंग, रंग में भंग पड़ने से बचाइये...... होली मिलने......... ।

हुरियारे का आप पर,
लग गया ठप्पा।
गाइये ठुमरी या गाइये टप्पा।
गुन गुनाइये मिलन की रागिनी,
नहीं बिहाग सुनाइये...... होली मिलने......... ।

ख़ुशी का दिन है नाचो और झूमो,
चाहे किसी के गले लगो चाहे जिसे चूमो।
उड़ाओ गुलाल,
करके रंगों की बरसात,
सबको सतरंगी बनाइये...... होली मिलने......... ।

खुला रख दर,
खुला रख दिल।
भूल कर गिले शिकवे,
आज सबसे मिल।
करिये न भेद भाव सबसे मिलिये मिलाइये...... होली मिलने......... ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा   



चित्र गूगल से साभार 
                 

Sunday, 6 March 2016

गाय महिमा

है गाय हमारी अस्मिता,
उसका धर्म-कर्म से नाता है।
नहीं गाय को पशु मानो,
वह हम सबकी माता है।
              माँ नहीं जिसको दूध पिला सकती है,
              वह गाय के दूध से पलता है।
              होने से पौष्टिक और सुपाच्य,
              बच्चे को समुचित बल मिलता है।
दिल दिमाग होता है दुरुस्त,
शरीर पुष्ट हो जाता है..........नहीं गाय को......................... ।
             पंच गव्य के प्रतिदिन प्रयोग से,
             जीवन में शुचिता आती है।
             मनुष्य स्थिर प्रज्ञ हो जाता है,
             मन की भटकन रुक जाती है।
वह सोचने लगता है भला-भला,
भद्र पुरुष कहलाता है..........नहीं गाय को........................... ।
             गाय के शरीर में है-
             कोटिश देवों का वास।
             उसकी सेवा से मिल जाता है,
             सब देवों का अनुग्रह अनायास।
अन्त समय जीव की मुक्ति को,
गौदान कराया जाता है..........नहीं गाय को...........................।
             गोवंश के संबर्धन को,
             गौ को संरक्षित करना होगा।
             उसकी सुरक्षा को उसको,
             राष्ट्रीय पशु घोषित करना होगा।
गाय की सेवा के कारण ही नन्द लाला,
गोपाला कहलाया जाता है..........नहीं गाय को........................... ।
                              
 जयन्ती प्रसाद शर्मा 



Friday, 26 February 2016

प्रवर बन्धु नमस्ते!

प्रवर बन्धु नमस्ते!
नहीं विसूरते देखा तुमको,
रहते हरदम हँसते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
नहीं दुखी करते क्या दुख तुमको,
शूल नहीं सालते क्या मन को।
कैसे सह लेते तन मन की पीड़ा,
इसका राज बताओ हमको।
दारुण दुख में भी नयन तुम्हारे,
देखे नहीं बरसते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
मैं नहीं पालता खुशफहमी,
मैं यथार्थ में जीता हूँ।
नहीं करता कोई कल्पना-
जहर को जहर समझकर पीता हूँ।
सुख-दुख नहीं करते उद्धेलित मुझको,
सहता हूँ समान समझते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
सुख औरों के नहीं करते-
मुझको दुखी
दुख औरों के नहीं करते-
मुझको सुखी।
मैं दायित्व निभाता हूँ-
मन से और हरषते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
मैं नहीं सोचता भूत भविष्य की-
वर्तमान में रहता हूँ।
मैं नहीं सहेजता वर्षों को,
पलों की चिन्ता करता हूँ।
बनते दिन, महीने और साल पलों से,
भविष्य के खुल जाते हैं रस्ते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।


जयन्ती प्रसाद शर्मा                   

Thursday, 11 February 2016

बसंत

आ गया बसंत मन भावना,
मौसम हुआ सुहावना।
फूल खिले हैं डाली डाली,
कूक रही कोयल मतवाली।
नाँच रहे मयूर होकर मगन, 
मनों में जगा रहे कामना............. आ गया बसंत........ ।
वातावरण में बढ़ गई खुशगवारियां,
हरित हो गई हैं क्यारियाँ।
महक गये हैं उपवन,
भवरों की गुंजन मिटा रही दुर्भावना......आ गया बसंत........ ।
जाड़े की जड़ता दूर हुई,
मनों की निराशा काफूर हुई।
पक्षियों का कलरव बना रहा, 
सुखद भविष्य की सम्भावना............. आ गया बसंत........ ।
फूल रही खेतों में सरसों,
साजन आ जायेंगे परसों।
खिली कली आशा की, 
लिख गई गोरी के मन में मिलन की प्रस्तावना............. आ गया बसंत....... ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 






Saturday, 30 January 2016

एक अन्वेषण

तुम्हारे कुशल प्रबंधन ने,
बना दिया है स्वर्ग- 
और तुमने इसकी प्रशस्ति भी पाई है।
मैं स्वर्ग वासी होना नहीं चाहता।
तुम नितांत पत्नी ही बनी रहीं,
मुझे भी बनाये रखा पतिदेव।
मुझे देवत्व स्वीकार्य नहीं है।
मैंने जब भी मिलाने चाहे नयन,
तुम अवनत ही देखती रहीं।
मैं तुम्हारी चंचल चितवन का आकांक्षी था।
तुमने भोगने दिया है अपने आप को-
बन्दिशों व हिदायतों के बीच।
मैं मुक्त साहचर्य का अभिलाषी था।
मैंने जब भी किया है प्रयत्न तुममें खोजने को प्रणयिनी,
तुमने कर दिया पहलू बदल कर विरोध-
और कठोर मन परिणयिनी ही बनी रहीं।
क्या यह मेरा दुराग्रह था?
मैंने तुम्हारे सर्द व्यवहार का नहीं किया मुखर विरोध-
बचने को लंपटता की लांछना से।
मैं पिसता रहा हूँ अपनी उन्मुक्त प्रेम की लालसा-
और तुम्हारी निर्लिप्तता के पाटों के बीच।
यह विडम्बना ही तो है।
आज जब खोज लिया गया है ईश्वरीय कण हिग्स बोसोन,
मेरा असफल अन्वेषण तुममें प्रीतिकण खोजने तक ही-
सीमित रहा है।
क्या मैं उपहास का पात्र नहीं बन गया हूँ?
जयन्ती प्रसाद शर्मा   

Saturday, 23 January 2016

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

परतंत्र भारत देश के कटक उड़ीसा संभाग में,
जन्मे सुभाष चन्द्र, जानकी नाथ के परिवार में।
१८९७ का 2३ जनवरी दिन था खास,
माँ प्रभावती के गर्भ से जन्मे वीर सुभाष।

सब कुछ था हर रोज जैसा,
ना कुछ ऐसा ना कुछ वैसा।
वायु यों ही चल रही थी,
सबसे सुन-सुन कह रही थी।

गीत ख़ुशी के गाओ सब–
मत हो ओ कोई उदास.... .... माँ प्रभावती के .. ...।

चमकीला सूरज चमक रहा था,
आसमान में दमक रहा था ।
चहक रहे थे पक्षी वैसे ही,
फूल खिले हर दिन जैसे ही।

फिर भी हर मन में जागा था–
एक अलग उल्हास ... ... माँ प्रभावती के ... ...।

माँ प्रभावती थीं सौर भवन में,
पिता सहन में अति आतुर थे मन में।
कोई बच्चे के रंग रूप से अवगत उन्हें कराये,
लग्नादि की गणना कर उसका भाग्य बताये।

बच्चे के जन्म के फलादेश का, 
करबाये आभास माँ प्रभावती के ... . ।

सन्यासी एक अचानक वहाँ पर आये,
व्यग्र देख पिता को सुन्दर वचन सुनाये। 
“बड़ा यश्वस्वी तेरा यह बालक होगा,
प्रखर देश भक्त और जन जन का नायक होगा।

होगा सत्य वचन यह मेरा-
कर मन में विश्वास’... .. माँ प्रभावती के ... ... ।

जय नेताजी, जय हिन्द।

जयन्ती प्रसाद शर्मा


Monday, 11 January 2016

मेॆघ दूत

बदरा कारे जारे, 
खबर साजन को दे आ रे।
बीतती जागते रैन, 
नहीं उन बिन पड़ता चैन।
बदन जलाती शीतल चाँदनी, 
नेह जल बरसा रे..........बदरा कारे.........।
बेदर्दी पिया,
तरसे जिया।
मन है विकल,
न कर आज कल चला आ रे...........बदरा कारे.......।
पंख मैं जो पाती,
उड़ कर चली आती। 
मैं का करूँ जतन,
आकर बता जा रे..........बदरा कारे........।
लगन तुमसे लगी,
मैं तुमने ठगी।
मुझको तुम बिन,
कुछ नहीं सुहाता रे........बदरा कारे.........।

जयन्ती प्रसाद शर्मा