Friday, 9 November 2018

बोलौ गोरी रहिहौं कित में,

बोलौ गोरी रहिहौं कित में,
कै काहू के आईं पाहुने,
देखी नहीं कबहू इत में।
मैं सब बीथिन में आवत जावत, 
घूमूँ वनखड़ में गऊ चरावत।
सिगरौ वृज मेरौ देखौ भालौ,
तुम दिखीं नहीं कबहू उत में।
कै तुम आईं नंद बवा के,
सर्वाधिक गउएँ खरिक में जाके।
कै तुम भूलि गयी हौ पथ,
चैन नहीं चित में।
बोलौ मैं का कर्म करूं,
तुम्हें कहाँ बिठाऊँ कहाँ धरूं।
छोड़ शर्म कहौ करिबे कूँ,
जो हो कर्म तुम्हारे हित में।
जयन्ती प्रसाद शर्मा






Monday, 5 November 2018

गांधीगीरी

अपनी नेतागीरी चमकाने को,
दबंग को गांधीगीरी दिखाने को।
वे पहुँच गये लेकर गुलाब के फूल,
पर वह नहीं हुआ अनुकूल।
फेंक दिये उसने नोंचकर फूल-
और चटा दी उनको धूल।
हाथ-पैर तुड़ाकर,
सिर फुटौबल करा कर।
चारपाई पर पड़े पड़े कराह रहे हैं,
गांधीगीरी ईजाद करने वालों को-
गालियाँ सुना रहे हैं। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा     

Saturday, 27 October 2018

जग दुख का आगार है(कुंडलियाँ)

जग दुख का आगार है नहीं रोइये रोज।
रोना धोना छोड़ कर सुख के कारक खोज।।
सुख के कारक खोज लगा लत नेक काम की।
कर दुखियों की मदद फिकर नहीं कर इनाम की।।
परमारथ की लगन जब तुम्हें जायेगी लग।
भूलोगे निज कष्ट लगेगा अति सुंदर जग।।

पोथी पढ़कर फैंक दी हुआ न कुछ भी ज्ञान।
नहीं किया चिंतन मनन सोये चादर तान।।
सोये चादर तान नींद में सभी भुलाने।
नहि मिल पाया ज्ञान अकिभी तक रहे अयाने।।
करें निरर्थक तर्क दलीलें देते थोथी।
दिया न कोई ध्यान फैंक दी पढ़ कर पोथी।।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Saturday, 20 October 2018

सुन चिड़े हो सावधान,

सुन चिड़े हो सावधान,
बदल गया है अब विधान।
हम दोनों हैं अनुगामी।
नहीं हो तुम मेरे स्वामी।
तुम मुझको नहीं  टोक सकोगे,
अब नहीं मुझको रोक सकोगे।
चाहे कहीं भी मैं जाऊँ,
चाहे किसी के नीड़ रहाऊँ।
तेरी ही होकर नहीं रहूँगी,
जहाँ  चाहूँगी मैं विचरूँगी।
मादाओं को नरों ने बहुत सताया,
अब आकर आजादी का सुख पाया।
प्रफुल्ल हैं नारियों के अन्तः करण,
जय हो तुम्हारी न्यायाधिकरण।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 13 October 2018

धृतराष्ट्र थे जन्मांध

धृतराष्ट्र थे जन्मांध,
सुनयना थीं गांधारी।
पटका  बाँध  बनीं  निरंध,
ओढ़ ली लाचारी।
अविवेकी मन कुंठित  बुद्धि ने,
करी वंश वृद्धि।
सौ पुत्रों को दिया जन्म,
कुविचारों की हुई  सृष्टि।
पुत्र मोही राजा रानी,
पुत्रों को दे न सके संस्कार।
उनके धर्म विरोधी कार्यों का,
कर न सके प्रतिकार।
जो कहा पुत्रों ने वही,
सत्य मान लिया।
दृष्टिहीन होने के कारण,
नहीं संज्ञान लिया।
उचित मार्ग दर्शन के अभाव में,
कुरु वंश में अनीति विस्तारित हुई।
उनका दंभ और अनीति,
महाभारत में निस्तारित हुई।
काश ! महारानी गान्धारी,
नयनी ही रहतीं।
नहीं होता महाभारत,
वंश नाश का दुःख नहीं सहतीं।
वे नहीं ओढतीं कृत्रिम अंधता,
बाँध कर पटका।
पति, पुत्रों और राज्य का,
करतीं बहुत भला सबका।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

चित्र गूगल से साभार


Friday, 5 October 2018

जिनके बिगड़े रहते हैं बोल

जिनके बिगड़े रहते हैं बोल,
बातों में विष देते घोल।
वे सोच समझ कर नहीं बोलते,
नहीं जानते शब्दों का मोल।
आपे में वे नहीं रहते हैं,
जो मुँह में आता है कहते हैं।
वे नहीं जानते छिछली बातों से,
खुल जाती है उनकी पोल।
कुछ लोग बातों का ही खाते हैं,
बातों से वे अपनी साख बनाते हैं।
रहता है समाज में उनका दब दबा,
बोलते हैं जो शब्दों को तोल।
बड़बोलेपन से अक्सर बात बिगड़ती है,
सम्बन्धों में पड़ती दरार और तल्खी बढ़ती है।
चाहत घट जाती है उनकी,
खत्म हो जाता है मेल जोल।
जितना हो सके कम बोलो,
जरूरत से ज्यादा मत बोलो।
नहीं ढोल की पोल खुलेगी,
बची रहेगी इज्जत अनमोल।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 29 September 2018

पावस की अमावस की रात

पावस की अमावस की रात 
किसी पापी के मन सी काली                                
घोर डरावनी 
गंभीर मेघ गर्जन                                                                
दामिनी की चमक कर देती है 
विरहणी को त्रस्त                                              
बादलों की गड़गड़ाहट से 
चपल चपला की कड़कड़ाहट से                                
वह चिहुक उठती है 
हो जाती है आशंकित  
बैरिन बीजुरी गिर न जाये नशे मन पर                            
डर कर सिमट जाती है 
लग जाना चाहती है प्रिय के सीने से
बरखा की शीतल बूंदें  
विरह से तपते शरीर पर                                               
लगतीं हैं तेजाब की फुहार सी 
उसकी बढ़ जाती है जलन                                 
वह कर उठती है सीत्कार 
अरे निर्दयी तुम्हें अभी परदेश जाना था                     
क्या नहीं लौटकर आना था 
देखकर मौसम की दुश्वारी
सोचकर क्या हालत होगी हमारी                                    
ओ संगदिल बेदर्दी सनम। 
जयन्ती प्रसाद शर्मा