Friday, 18 January 2019

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी!
तेरी ज़िन्दगी
मेरी ज़िन्दगी
इसकी ज़िन्दगी
उसकी ज़िन्दगी
हम सबकी ज़िन्दगी।
रोती है ज़िन्दगी
रुलाती है ज़िन्दगी
हँसती है ज़िन्दगी
हँसाती है ज़िन्दगी
सबकी मुस्कराती है ज़िन्दगी।
सकाम होती है ज़िन्दगी
निष्काम होती है ज़िन्दगी
बदनाम होती है ज़िन्दगी
गुमनाम होती है ज़िन्दगी
अंजाम ढोती है ज़िन्दगी।
चलती है ज़िन्दगी
दौड़ती हैं ज़िन्दगी
घिसटती है ज़िन्दगी
सिमटती है ज़िन्दगी
थमती है पूर्ण विराम पाती है ज़िन्दगी।
यही चिरंतन सत्य है।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 12 January 2019

जाड़े की एक सुबह

कुहासे की चिलमन से झाँकते सूर्य ने
भेज दीं कुछ किरणें भूमि पर
वे लगीं बड़ी भली
सर्द शरीरों में पड़ गई जान
खुल गए अंग
उठी मन में उमंग
गीत लेने लगे अंगड़ाई
पत्तों पर पड़ी ओस
हो गई विगलित
बहने लगी बन कर जल
नहा उठे वृक्ष
खिल गईं कलियाँ
निखर गए पुष्प
उपवन हो गये मोहक
सर्दी से त्रस्त परिंदे
छोड़ कर नीड़ चहचहाने लगे
समाप्त हो गई नीरवता
पीली कमजोर धूप पसराने लगी
बदन सहलाने लगी
सर्वत्र बिखर गया हेम
जड़जड़ाते लोग
पूंछते कुशल क्षेम
जग जग पड़ा
संसार चल पड़ा
धन्यवाद सूर्यदेव।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

चित्र गूगल से साभार

Sunday, 6 January 2019

उलझन

बोला गुरू से शिष्य,
मेरी उलझन सुलझाइए।
अंतरंग परिचय मेरा,
मुझसे कराइये।
मैं मन हूँ या तन हूँ,
नूतन हूँ पुरातन हूँ।
मैं अपने को समझ न सका,
मैं कौन हूँ बताइये।
मैं भोगी हूँ या भोग हूँ,
योगी हूँ या योग हूँ।
मैं कैसे स्वयं को परिभाषित  करूं,
मुझे समझाइये।
इस वासना के संसार में मैं भटक गया हूँ,
हो गया हूँ दिशा भूल और अटक गया हूँ।
कन्टकों में उलझा जीवन,
मुझको बचाइये।
नहीं मैं इधर रहा नहीं उधर रहा,
त्रिशंकु सा अधर में लटका रहा।
इस दुसह्य स्थिति से निकलने  को,
दिशा दिखाइये।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Sunday, 30 December 2018

अब तुम शीत कहाँ से आये?

अब तुम शीत कहाँ सेआये?
ढूँढत रहे ग्रीष्म भर तुमको,
हमको तुम नहीं पाये.........अब तुम..।
              हम रहे ढूंढते वन उपवन में,
              ताल तलैया और पोखरन में।
              नदियाँ और तालाब खंगाले,
              कीन्हीं खोज सघन कुंजन में।
पाने को गर्मी से राहत,
रहते थे बिजन डुलाये...........अब तुम..।
              गर्मी तो हमें सताती ही थी,
              तुम भी निष्ठुर बने रहे।
              पाने को क्षणभर शीतलता,
              हम रहते घन्टों पानी में खड़े रहे।
भीषण ताप से मुक्ति हेतु,
सौ सौ बार नहाये...........अब तुम ..।
              तुम भी क्या करते बेचारे,
              संकट में थे प्राण तुम्हारे।
              कैद में थे धनिकों की तुम,
              पाते थे शीतलता एसी कूलर बारे।
भये बरबंड छूट कैद से,
कहर रहे बरपाये......अब तुम...।
              जाड़े में सर्दी करे जुलम,
              कपड़ों की गठरी बन गये हम।
              वस्त्रों से जितना ढाँपे तन,
              उतना ही सर्दी करे सितम।
चाय गटकतेअलाव तापते,
हम जाड़े के दिन रहे बिताये...अब तुम..।
जयन्ती प्रसाद शर्मा
चित्र गूगल से साभार






Monday, 24 December 2018

हाइकु

सदुपयोग
करो अवसरों का
फल मिलेगा।

रहो सजग
नहीं हो अपकर्म
सुखी रहोगे।

भाई साहब
आप न हों उदास
रखें धीरज।

मिलेगा चीता
उचित अवसर
जब आयेगा।

रखें भरोसा
हो सकती है देर
नहीं अंधेर।

नंद के छैया
सबकी सुनते है
वंशी बजैया।

पाओगे पार
दुखों के झंझावात
मिट जायेंगे।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Friday, 14 December 2018

वह समझ न सकी

वह समझ न सकी वह समझा न सका,
बीत गई उम्र समझते समझाने में।
कुछ ऐसे तल्ख हुये रिश्ते,
वह अब बैठा करते हैं मयखाने में।
           खेल-खेल में ले लिया दर्द,
           अब झेले नहीं झिलता है।
           वे हो गये हैं बेदर्द और रूखे,
           नहीं उनकी फितरत से चैन मिलता है।
नहीं चल सकोगे साथ मेरे,
कह कर दिल उन्होंने तोड़ दिया,
पर मैं हो नहीं सका उनसे जुदा,
उनकी यादों से खुद को जोड़ लिया।
            थोड़ी सी मुझे पिला दे साकी,
            तौर ए मुहब्बत सिखला दे।
            कैसे हो जाता है प्यार किसी से,
            यह राज मुझे भी बतला दे।
उनकी बेरुखी से दिल मेरा जला कोई बात नहीं,
चमक से उसकी कई घर रोशन हो गये है।
कई दिनों से ठंडे पड़े चूल्हे,
उसकी तपिश से गर्म हो गये हैं।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Sunday, 9 December 2018

लघु कथा

युवा सन्यासी के गौर वर्ण और आकर्षक देह यष्टि से प्रभावित होकर रूप गर्विता स्त्री ने उनसे प्रवचन के पश्चात एकान्त में मिलने की इच्छा प्रकट की। उसने स्वामीजी से एकान्त में कहा कि वह उन जैसे तेजस्वी पुत्र की माँ बनना चाहती है। स्वामीजी ने एक क्षण सोचा और मुस्कराते हुए कहा कि इसमें कोई हानि नहीं है परंतु उसको भी उनकी एक शर्त माननी होगी। जब प्रफुल्ल मन स्त्री ने स्वामी जी से उनकी शर्त के बारे में पूँछा तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि अपनी इच्छा पूर्ति के लिये पहले आपको मेरी माँ बनना पड़ेगा। उसके बाद मैं आपका पुत्र हो जाऊँगा और मुझ जैसे पुत्र की माँ बनने की आपकी इच्छा पूरी हो जायेगी।स्वामी जी का उत्तर सुन कर वह स्त्री लज्जित हो गई। उसने स्वामी जी का अभिवादन किया और वहाँ से चली गई।
जयन्ती प्रसाद शर्मा