Thursday, 13 September 2018

गणेश वन्दना

जय गणेश गिरिजा नन्दन, करते हैं तेरा वंदन................. जय गणेश.....।

शंकर सुवन भवानी नन्दन-
हम शरण तुम्हारी आये हैं।
पान, फूल, मेवा, मिष्ठान-
हम पूजा को लाये हैं।
सिंदूर का मस्तक पर तिलक लगा कर-
करते हैं तेरा अभिनन्दन.................जय गणेश.....।
मूषिकारुढ़ प्रभु कृपा करें,
भक्तों का संताप हरें।
अशुभ-अलाभ को करें दूर,
सबका मंगल आप करें।
भक्तिभाव से स्मरण तुम्हारा-
हम कर रहे सभी है भय भंजन।.......जय गणेश.....।
हे वक्रतुण्ड हे महाकाय,
दीनों के प्रभु करें सहाय।
अति प्रचंड है तेज तुम्हारा-
पटक पतितों का दें जलाय।
करें अभय संतप्त जनों को-
जो कर रहे दुखी हो कर क्रंदन..........जय गणेश.....।
अष्टसिद्धिनव निधि के दाता,
हों प्रसन्न हे बुद्धि प्रदाता।
द्दार तुम्हारे जो कोई आता,
खाली हाथ न कोई जाता।
स्वीकार करें प्रभु नमन मेरा-
हे गजमुख हे शिवनन्दन.................जय गणेश.....।
जयन्ती प्रसाद शर्मा






Saturday, 8 September 2018

सखी री मैं उनकी दिवानी

सखी री मैं तो उनकी दिवानी,
नहीं आवै उन बिन चैन।
मन तड़पत घायल पंछी सौ,
विरह करै बेचैन.................सखी री...........।
                    बानि पड़ी ऐसी अंखियन को,
                    प्रतिक्षण देखन चाहत उनको।
                    नहीं दिखाई दें वे पलभर,
                    लगें बरसने नैन....सखी री...........।
यादें उनकी जब जब आवें,
उठे हूक सी मन घबरावै।
कहा करूँ कुछ समझ न पाऊँ,
बीते जागते रैन........................सखी री...........।  
                    पड़े फफोले विरहानल के,
                    घाव टीसते हैं अब मन के।
                    पीर ह्रदय की सही न जावै,
                    लगी बहुत दुख देन.......सखी री...........।  

जयन्ती प्रसाद शर्मा
    

Friday, 31 August 2018

मैं अनुरागी श्री राधा कौ

मैं अनुरागी श्री राधा कौ!
नाम लेत बन जाती बिगड़ी,
महा मंत्र भव बाधा कौ•••।
राधा प्रसन्न, मैं प्रसन्न,
बात नही है यह प्रच्छन्न।
कर न सकूँगो मैं अनदेखी,
उनके भक्तों की ब्याधा कौ•••।
बिन राधा के श्याम अधूरौ,
कर न सकूं कोई काम मैं पूरौ।
वे हैं मेरी कर्म शक्ति,
मैं उन बिन प्रतीक आधा कौ•••।
मेरी पूरक बृषभान किशोरी,
राधे श्याम की अविचल जोड़ी।
कांतिमान हूँ उनसे ही मैं,
आभारी उनकी आभा कौ•••।
जयन्ती प्रसाद शर्मा



Sunday, 26 August 2018

मधुकर मत कर अंधेर

मधुकर मत कर अंधेर। 
अभी कली है नहीं खिली है,
नहीं कर उनसे छेड़।
वे अबोध हैं तू निर्बोध है,
प्रीत की रीत का नहीं प्रबोध है।
समझेंगी वे चलन प्रेम का,
रे भ्रमर देर सवेर.....................मधुकर मत........।
रह भँवरे तू कुछ दिन चुप,
खिलने दे कलियाँ बनने दे पुष्प।
चढ़ने दे उन पर मौसम के रंग,
मादक बनते नहीं लगेगी देर........मधुकर मत........।
खिल कर कलियाँ जब पुहुप बनेंगी,
उपवन को मोहक कर देंगी।
उड़ेगा पराग होगी सुरभित बयार,
चाहे फिर मकरंद चुराना एक नहीं दस बेर...मधुकर मत........।  
तू हरजाई है वे जानती हैं,
तेरी फितरत पहचानती हैं।
नहीं रहेगा उनसे बँधकर-
लेकर रस उड़ने में होगी नहीं अबेर.........मधुकर मत........।  

जयन्ती  प्रसाद शर्मा  
           

Sunday, 12 August 2018

जय शिव शंकर

जय शिव शंकर बम भोले।
पी गये गरल,
जैसे पेय तरल।
न बनाया मुंह,
न कुछ बोले ......जय शिव शंकर।
थी लोक कल्याण की भावना,
सबके प्रति थी सद्द्भावना।
हुआ कंठ नीलाभ,
भड़कने लगे आँख से शोले ......जय शिव शंकर।
चन्द्र कला सिर पर धरी उसकी शीतलता से विष ज्वाल हरी।
हुये शान्त उमाकांत,
सामान्य हुए हौले हौले ......जय शिव शंकर।
पसंद अपनी अपनी अपना खयाल,
लटकाये रहते कंठ व्याल।
आक धतुरा है अति प्रिय,
सटकते रहते भंग के गोले .....जय शिव शंकर।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Monday, 6 August 2018

ढाक के तीन पात

उसकी बात बात होती है,
मेरी बात गधे की लात।
लग जाये तो ठीक है वरना,
उसकी नहीं कोई बिसात।
                मैं जब तक प्रश्न समझ पाता हूँ,
                वह उत्तर दे देती है।
                मैं जब तक विषय में उतराता हूँ,
                वह समाधान दे देती है।
देख कर उसकी तत्परता,
मैं रह जाता हूँ अवाक्............................लग जाये तो.....................।
                वह नहीं जाती शब्दों की गहराई में,
                सीधा मतलब ले लेती है।
                जलपान कराने की कहने पर,
                लोटा भर कर जल दे देती है।
मैं प्रशिक्षु सा लगता हूँ,
वह लगती है पूर्ण निष्णात......................लग जाये तो....................।
                मेरे समझाने पर वह,
                मेरी क्लास ले लेती है।
                मंहगाई का कुछ करो ख्याल,
                मुझे उपालम्भ दे देती है।
इतना समझाती हूँ फिर भी-
रहते हो ढाक के तीन पात........................लग जाये तो....................।

जयन्ती प्रसाद शर्मा                        

Wednesday, 28 February 2018

अबकी बरस नहीं छोड़ूँगी

आयौ बसंत फूली सरसों,
खेतों से सौंधी महक उठी।
सोये से तरुवर जाग उठे
चिड़िया आँगन में चहक उठी।

पक गये धान मगन भये किसान,  
ओठों पर तैरी मुस्कान। 
चंग बजाते रंग जमाते
गाते सोरठ-फगुआ के गान। 

बात बात पर हँसती छोरी,
घूँघट में गोरी मुस्काती है। 
करती रह-रह कर सैन मटक्का
प्रीतम को भरमाती है। 

पिछली बरस मैं चूक गई,  
पर अबकी नहीं छोड़ूँगी।
खेलूँगी मैं तुम संग होरी
देवर को हू रंग में बोरुँगी।


जयन्ती प्रसाद शर्मा 

चित्र गूगल से साभार