Sunday, 12 August 2018

जय शिव शंकर

जय शिव शंकर बम भोले।
पी गये गरल,
जैसे पेय तरल।
न बनाया मुंह,
न कुछ बोले ......जय शिव शंकर।
थी लोक कल्याण की भावना,
सबके प्रति थी सद्द्भावना।
हुआ कंठ नीलाभ,
भड़कने लगे आँख से शोले ......जय शिव शंकर।
चन्द्र कला सिर पर धरी उसकी शीतलता से विष ज्वाल हरी।
हुये शान्त उमाकांत,
सामान्य हुए हौले हौले ......जय शिव शंकर।
पसंद अपनी अपनी अपना खयाल,
लटकाये रहते कंठ व्याल।
आक धतुरा है अति प्रिय,
सटकते रहते भंग के गोले .....जय शिव शंकर।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Monday, 6 August 2018

ढाक के तीन पात

उसकी बात बात होती है,
मेरी बात गधे की लात।
लग जाये तो ठीक है वरना,
उसकी नहीं कोई बिसात।
                मैं जब तक प्रश्न समझ पाता हूँ,
                वह उत्तर दे देती है।
                मैं जब तक विषय में उतराता हूँ,
                वह समाधान दे देती है।
देख कर उसकी तत्परता,
मैं रह जाता हूँ अवाक्............................लग जाये तो.....................।
                वह नहीं जाती शब्दों की गहराई में,
                सीधा मतलब ले लेती है।
                जलपान कराने की कहने पर,
                लोटा भर कर जल दे देती है।
मैं प्रशिक्षु सा लगता हूँ,
वह लगती है पूर्ण निष्णात......................लग जाये तो....................।
                मेरे समझाने पर वह,
                मेरी क्लास ले लेती है।
                मंहगाई का कुछ करो ख्याल,
                मुझे उपालम्भ दे देती है।
इतना समझाती हूँ फिर भी-
रहते हो ढाक के तीन पात........................लग जाये तो....................।

जयन्ती प्रसाद शर्मा                        

Wednesday, 28 February 2018

अबकी बरस नहीं छोड़ूँगी

आयौ बसंत फूली सरसों,
खेतों से सौंधी महक उठी।
सोये से तरुवर जाग उठे
चिड़िया आँगन में चहक उठी।

पक गये धान मगन भये किसान,  
ओठों पर तैरी मुस्कान। 
चंग बजाते रंग जमाते
गाते सोरठ-फगुआ के गान। 

बात बात पर हँसती छोरी,
घूँघट में गोरी मुस्काती है। 
करती रह-रह कर सैन मटक्का
प्रीतम को भरमाती है। 

पिछली बरस मैं चूक गई,  
पर अबकी नहीं छोड़ूँगी।
खेलूँगी मैं तुम संग होरी
देवर को हू रंग में बोरुँगी।


जयन्ती प्रसाद शर्मा 

चित्र गूगल से साभार 



Saturday, 25 November 2017

स्वाभिमान

दम्भी पुत्र जिसको पिता ने घर से  निकाल दिया था, ने छल-बल से घर में पुनः प्रवेश किया और गर्वोक्ति से पिता से कहा, पापा मैं आ गया हूँ, आप हार गये। पिता ने शान्त स्वर में कहा “ठीक है तुम रहो, मैं जा रहा हूँ"।
अगले ही पल स्वाभिमानी पिता का निस्पंद शरीर कुर्सी पर लुढ़क गया।  

जयन्ती प्रसाद शर्मा       

Friday, 27 October 2017

प्रजा तंत्र का दोष

प्रजा तंत्र का दोष है, तंत्र रहे कमजोर। 
शाह झांकते है बगल, हावी रहते चोर।।
बागी-दागी तंत्र को, कर देते कमजोर
शासन का इन पर नहीं, चल पाता है जोर।। 
तुष्टिकरण समाज में, पैदा करता भेद 
बढ़ जाते हैं भेद से, आपस में मतभेद।। 
मैं चाहूँ मेरी बने, एक अलग पहचान 
इनका उनका सा नहीं, बनूँ भला इन्सान।।
साईं इस संसार में, सबसे मीठा बोल 
यदि करता हो व्यापार, सबको पूरा तोल।। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा  

Saturday, 21 October 2017

जय हनुमान महाबलवान

जय हनुमान महाबलवान,
रक्षा करो,
करों दुखों का शमन दुष्टों का दमन,
नहीं किसी आदेश की प्रतीक्षा करो .............जय हनुमान....।
                            तुम प्रखर बुद्धि हो,
                            स्वयं सिद्ध हो।
                            भक्तों का दुख हरने को,
                            अति प्रसिद्ध हो।
निजजनों के धैर्य की,
नहीं इन्तेहा करो ......................................जय हनुमान....।
                            दमन दुष्टों का तुम्हारे-
                            जन्म का मर्म है।
                            करना राम नाम का प्रसार,
                            तुम्हारा प्रिय कर्म है।
अब विस्मरण हो रहा राम-नाम का,
उसे प्रचारित करो ......................................जय हनुमान....।
                            नारियों का लोग हरण,
                            बहुतायत से कर रहे हैं।
                            कर रहे उन संग दुराचार,
                            क्षरण अस्मिता का कर रहे हैं।
मातृशक्ति की अविलम्ब प्रभु,
सुरक्षा करो................................................जय हनुमान....।   

जयन्ती प्रसाद शर्मा 


Tuesday, 19 September 2017

जहाँ तुम थे

जहाँ तुम थे वहाँ मैं भी था,
किसी पुस्तक सी प्रस्तावना सा।
तमाम किन्तु परन्तुओं के बीच,
स्वीकार्यता की सम्भावना सा।
उन मान्यनीयों के बीच,
मैं था जैसे दुर्गंधमय कीच।
मैं सहता रहा वाग्वाण,
धनहीन की अवमानना सा।
वहाँ नहीं थी मेरी कोई वकत,
कारण था मेरी निर्धनता फ़क़त।
फिर भी मैं रहा वहाँ,
अपनों की शुभकामना सा।
सब थे अपने आप में मस्त,
सभी थे दुर्भावना के अभ्यस्त।
मैं बना रहा सहद्यों में,
‘सर्वेभवन्तु सुखिन' की कामना सा।

जयन्ती प्रसाद शर्मा