Saturday, 1 April 2017

वक्त का मरहम

है जन्म अनिश्चित मृत्यु शाश्वत सत्य है ,
नहीं कुछ भी स्थिर सब अनित्य है।
जैसा जिसका भोग है रहता है वह साथ।
जाने की बेला में चल देता है पैदा कर निर्वात।
नहीं आत्मा का कोई होता रिश्ता नहीं कोई नाता,
इस संसार के रंगमंच पर शरीर ही हर किरदार निभाता।
सब हैं सब कुछ जानते नहीं कोई अनभिज्ञ,
पड़ ममता के फेर में कष्ट उठाते अज्ञानी और विज्ञ।
इसने, उसने, मैंने, तुमने गम अपनों के जाने का उठाया,
किसी ने पत्नी किसी ने भाई किसी ने पुत्र गँवाया।
कितना भी कोई शोक संतप्त हो नहीं साथ मृतक के जाता,
ऐसे ही चलता रहता है संसार सब्र मन में आ जाता।
लोगों की सान्त्वना वक्त का मरहम हर पीड़ा हर लेता है,
कितने भी गहरे हों घाव, हर व्रण को भर देता है।  

जयन्ती प्रसाद शर्मा            
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