Sunday, 4 August 2019

सावन मनभावन

घिर घिर बदरा आबते, बिन बरसें उड़ जांय।
नीको जोर दिखावते ,पर बरसत हैं नायँ।
पर बरसत हैं नायँ ,दया नहि दिखलाते हैं।
गरजत चमकत खूब,नहीं जल बरसाते हैं।
रहते चलायमान ,बादल रहते नहीं थिर।
नहि होती बरसात, जलद आते हैं घिर घिर।

सावन सगुन मनाइये झूला झूलौ जाय, 
पैंग बढ़ाइ लेउ पकड़ बदरा उड़ नहि जाय।
बदरा उड़ नहि जाय  मेघ बरस पहले यहाँ ,
फिर चाहौ उड़ जाउ  या बरसौ चाहे जहाँ।
कह दादू कविराय जल बरसाते श्याम घन,
भले गये दिन आय  झूम कर आया सावन।
                       

जयन्ती प्रसाद शर्मा

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

वाह सुन्दर।

दिगम्बर नासवा said...

वाह ... सुन्दर रचना है ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (07-08-2019) को "पूरे भारतवर्ष में, होगा एक विधान" (चर्चा अंक- 3420) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Alaknanda Singh said...

वाह शर्मा जी, काका हाथरसी की याद द‍िला दी आपने