Saturday, 25 April 2020

कोई कब महामारी में नप जाये

पता नहीं आँख कब झप जाये,
कोई कब महामारी में नप जाये।
रुका हुआ जो आँख में आँसू,
पता नहीं कब टप जाये।
वक्त का तकाजा है,
नहीं किसी से मिलो गले।
नहीं मिलाओ हाथ किसी से,
अज़ीज कोई हो कितना भले।
लेकिन रहे खयाल,
न हो किसी का अपमान।
रखें भावना शुद्ध,
मन से करें सम्मान।
हाथ जोड़ कर करें-
नमस्ते दूर से।
चेहरे पर हो सरलता,
दिखें नही मद में चूर से।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सार्थक रचना

Jayanti Prasad Sharma said...

बहुत बहुत धन्यवाद महोदय।