Monday, 2 March 2015

भ्रष्टाचार

इस देश में भ्रष्टाचार बढ़ गया है भयावह स्तर तक,
फैल गया है यह, सुविस्तारित वट वृक्ष सा।
बढ़ कर इसकी जटायें मिल गयी हैं जड़ों से-
और समा गई हैं गहरे, मानस मन की भूमि में।
भ्रष्टाचार का यह अकेला ही वृक्ष अब हो गया है सघन वन-
और बन गया है अभयारण्य, अनाचारियों का दुराचारियों का।
इसकी सघनता और हरित अंधकार में अपराधी सहज ही-
छिपा लेते है अपने आपको,
अपने कदाचारानुसार पापिष्ट ढूंढ लेते है अपने लिए आश्रय।
कुछ छिप जाते हैं इसके कोटरों में, चिपक जाते हैं कुछ इसकी जड़ों से-
कीड़े मकोड़ों से,
कुछ दिनांध उलूक से बैठ कर इसकी शाखों पर बिता देते हैं अपना निर्वासन-
और कुछ उल्टे लटक जाते हैं चमगादड़ों की तरह।
कुछ चयनित और निर्वाचितों को इसकी हरीतिमा करती है बहुत आकर्षित।
वे स्वत: ही खिचे चले आते हैं इसकी ओर बोधिसत्व पाने को।
अधिक धन प्राप्ति का मार्ग तलाशना ही है उनका बोधिसत्व।
समझ नहीं आता कैसे हो पायेगा इस भ्रष्टाचार के वृक्ष का-
समूल नाश ?
कैसे पूरी हो पायेगी परिकल्पना-
भ्रष्टाचार मुक्त समाज के निर्माण की।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 14 February 2015

वैलेन्टाइन डे

बाजार में देखकर युवक युवतियों की भीड़,
करते देखकर खरीदारी भेंट में दी जाने वाली बस्तुओं की,
मैं रोक न सका अपनी जिज्ञासा,
मुझे बताया गया आज है वैलेंटाइन डे।
इस दिन प्रेमी प्रेमिका करते हैं इजहार अपने इश्क का।
लेते-देते हैं भेंट, मुख्यत प्रेम के प्रतीक गुलाब का।
मुझे हुआ मलाल हमारे समय में न थी कोई ऐसी परम्परा,
न था कोई दिन निश्चित प्रेम के प्राकट्य का।
ग्लानि हुई मैंने पत्नी से न किया कभी इजहारे इश्क,
न दी कोई भेंट।
भावावेश में मैंने खरीद लिया एक सुर्ख लाल गुलाब।
पहुँच कर घर प्रफुल्ल मन से पत्नी को बुलाया,
आज कहूँगा इलू इलू मैंने उसे बताया,
और करने का गुलाब पुष्प अर्पित, अपना मनतब्य बताया।
सुनकर वह भड़क गयी घोड़ी सी।
झपटकर छीन लिया गुलाब का फूल, फेंक कर एक ओर मुझे घुढ़काया।
बोली बुढ़ापे में छिछोरी हरकत से बाज आइये,
जाइये बाजार से सब्जी के लिये एक अच्छा सा,
गोभी का फूल लेकर आइये।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 







Monday, 2 February 2015

माँ शारदे वर दे

वर दे,
माँ शारदे वर दे !
गौर वर्णा, धवल वसना,
श्वेत शतदल राजती।
बुद्धि सुधारिन, विद्दया दायिन, 
कर में पुस्तक धारती।
सुप्तजनों को जाग्रत करने, 
माँ वीणा की झंकार कर दे ... ... वर दे माँ ... ...।
ज्ञान दीप प्रदीप्त कर,
तम ह्र्दय का नष्ट कर। 
विद्दया के प्रसार से,
अज्ञानता को दूर कर।
ज्ञान के प्रकाश से-
माँ मन मेरा आलोकित कर दे ... .. वर दे माँ ... ...।

जयन्ती प्रसाद शर्मा



Friday, 23 January 2015

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन.....

यह हैं मेरे आदर्श नित्य मैं इनकी पूजा करता हूँ,
धूप, दीप और नैवेद्य प्रतिदिन अर्पित करता हूँ।
तुम भी श्रद्धा भाव से नमन इनको कीजिये,
प्रखर देश भक्ति का वरदान इनसे लीजिये।

परतंत्र  भारत देश के कटक उड़ीसा संभाग में,
जन्मे सुभाष चन्द्र, जानकी नाथ के परिवार में।
१८९७  का 2३ जनवरी दिन था ख़ास,
माँ प्रभावती के गर्भ से जन्मे वीर सुभाष।

सब कुछ था हर रोज जैसा,
ना कुछ ऐसा ना कुछ वैसा।
वायु यों ही चल रही थी,
सबसे सुन-सुन कह रही थी।

गीत ख़ुशी के गाओ सब–
मत होओ कोई उदास....   ....    माँ प्रभावती के .. ... ।

चमकीला सूरज चमक रहा था,
आसमान में दमक रहा था ।
चहक रहे थे पक्षी वैसे ही,
फूल खिले हर दिन जैसे ही।
                          
फिर भी हर मन में जागा था–
एक अलग उल्हास ... ...         माँ प्रभावती के ... ...  ।

जय नेताजी, जय हिन्द।


जयन्ती प्रसाद शर्मा










Sunday, 11 January 2015

उड़ गया हंस अकेला

उड़ गया हंस अकेला।
सम्बंधी कोई साथ नहीं है,
रिश्तों की बारात नहीं है।
बेटा, बेटी, नाती, पोते,
दूर नहीं जो तुझसे होते।
छूट गये सब संगी साथी–
छूट गया दुनिया का मेला ..........उड़ गया .......।
झूँठ,  प्रपंच का लिया सहारा,
इसको झटका उसको मारा।
दौलत के अम्बार लगाये,
महल दुमहले भी बनबाये।
धन दौलत सब धरे रह गये-
साथ गया ना धेला ....................उड़ गया...........।
वाणी में तेरी कड़क बड़ी थी,
काया में तेरी अकड़ बड़ी थी।
क्रोध बरसता था आँखों से,
जहर उगलता था बातों से।
टूट गई सांसों की डोरी-
पडा रह गया बदन रुपहला .............उड़ गया..........।
सिया राम मय सब जग जानी,
करहु प्रनाम जोरि दोउ पानी।
दया धर्म का आश्रय लीजे,
प्राणिमात्र की सेवा कीजे।
सत्कर्मों से संत्रास रुकेगा–
जब यम दूतों का आएगा रेला ...........उड़ गया ......।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Wednesday, 31 December 2014

आ गया नव वर्ष

आ गया नव वर्ष 

आ गया नव वर्ष।
प्रियवर आपको शुभकामना,
हम देते हैं सहर्ष।
      शुभ-सुख, चैन की वृष्टि होती रहे,
      धन धान्य की वृद्धि होती रहे।
है यह मंगल कामना हमारी,
आपका होता रहे उत्कर्ष.....आगया..................।
      नव वर्ष लाये आपके जीवन में बहार,
      होता रहे सम्मान गले में पड़ते रहें फूलों के हार।
स्थायित्व आप पा जायें,
नहीं रहें तदर्थ..............आ गया......................।
      पूर्ण होता रहे मनोरथ आपका,
      सफल होता रहे श्रम आपका।
हों फलीभूत आपके प्रयास,
जायें नहीं व्यर्थ............आ गया..................... ।
      आप सदा सर्वदा रहें सुखी,
      मिलती रहे आपको ख़ुशी।
दुख नहीं फटके पास आपके
नहीं होवे कोई अनर्थ।



जयन्ती प्रसाद शर्मा


             

Sunday, 28 December 2014

आपका दिल हमारे पास है

आपका दिल हमारे पास है।
छिपा रखा है हमने उसे अपने दिल में।
मेरा यह दिल अति सुरक्षित है-
प्यारी प्यारी मूल्यवान वस्तुयें रखने के लिये।
नयनों की निगाहवानी से रक्षित मेरे दिल में-
नहीं संभव है किसी दुर्मति दुर्मना का सहज प्रवेश,
इसीलिये कुछ लोग मुझे संग दिल मानते हैं।
यह अन्दर से अति कोमल है।
मैं विश्वास दिलाता हूँ आपका दिल वहां रहेगा-
पुर सुकून।
वहां रहतीं हैं मेरी कोमल भावनायें भी।
उनके साथ वह कर सकता है अठखेलियां-
और भर सकता है उडान।
निवेदन है,मेरी इन सुकोमल भावनाओं से-
आपका दिल ना खेले कोई खेल।
वे इतनी कोमल हैं तनिक सी ठेस लगने से-
मर जायेंगी।
मेरा नर्म दिल भी सह ना सकेगा आघात,
टूट जायेगा और बिखर जायेगा वह।
मै टूटे और बिखरे दिल के साथ कितना जी सकूँगा-
यह आपके विचार का विषय है।

जयन्ती प्रसाद शर्मा