Monday, 29 June 2015

संघातिक हैं नयन तुम्हारे

संघातिक हैं नयन तुम्हारे,
जब से नजर मिलाई तुमने–
दुर्दिन आये हमारे . . . . संघातिक ......।

कनखइयों से मारी दीठ,
मुस्काईं फिर देकर पीठ।
उतराये सीधे मेरे मन,
चंचल नयन तुम्हारे ढीठ।

वक्र-भंगिमा अड़ गई मन में–
निकसी नहीं निकारे . . . . संघातिक ....।

बिन काजल कजरारे नैन,
कर देते हैं मुझको बेचैन।
फंस गई जान कफस में मेरी,
बदलते करवट बीतति रैन।

घूमूँ दिन भर बना बावला–
ज्यों ज्वारी धन हारे . . . . संघातिक ....।

अब और न मुझे सताओ तुम,
एक दया दिखलाओ तुम।
नहीं निहारो वक्र दृष्टि से,
मृत्यु बिन आई से मुझे बचाओ तुम।

बे मौत न मारा जाँऊ–
तेरी तिरछी नजर के मारे ....संघातिक ....।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 
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