Tuesday, 5 April 2016

नहीं छेड़ा तुमने कोई तराना

नहीं छेड़ा तुमने कोई तराना मेरे आने पै,
लगता है फर्क नहीं पड़ता है तुमको, मेरे नहीं आने पै।
मैं घुसता चला गया प्रकोष्ठ में,
चुम्बन जड़ दीना तुम्हारे ओष्ठ में।
तान दुपट्टा तुम सोई थीं,
शायद सपनों में खोई थीं।
पड़ी रहीं अलसाती, नहीं जागी तुम मेरे जगाने पै..... लगता है...............।
बाँहों में तुमको लीना,
अंकबद्ध तुमको कीना।
मुंदित नयन तुम पड़ी रहीं,
प्रस्तर प्रतिमा सी बनी रहीं।
नयनोन्मीलन कीना, पर नहीं झपकायी पलकें मेरे नयन मिलाने पै..... लगता है...............।
अति उत्साहित था मेरा मन,
नजरों में बसा था तेरा तन।
नहीं सब्र था पलभर मुझको,
स्पर्श किया उद्धेलित हो तुमको।
सहलाया मैंने बड़े प्रेम से, पर नहीं आई तुम्हें झुरझुरी मेरे सहलाने पै..... लगता है...............।
लेकर नाम पुकारा हमने,
सुनी अनसुनी कर दी तुमने।
बहुत क्रोध मुझको आया,
मैं मन मार चला आया।
प्रश्न कचोटता रहा रातभर, क्यों नहीं आई तुम मेरे बुलाने पै..... लगता है...............।


जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Thursday, 24 March 2016

बाज रहे ढोल ढप

बाज रहे ढोल ढप,
बाज रही चंग।
खेल रहे होरी श्याम,
राधा जी के संग।
              संग लिये ग्वाल बाल,
              आये नंदलाल।
              अंटी में रंग लाये,
              मुटठी में गुलाल।
              मन में नेह भरौ,
              अंखियन में उमंग............... खेल रहे............. ।
कान्हा के मन उठी उचंग,
राधिका पै डारौ रंग।
सात रंग कौ लहँगा भीजौ
चूनर भीगी पचरंग।
पिचकारी की सम्मुख फुहार से,
चोली भई तंग............... खेल रहे............. ।
              नाँच रहे ग्वाल-बाल,
              गोपिन को रिझाई रहे
              कर रहे खींच तान-
              और शोर मचाय रहे।
              ग्वालिनों पर रंग डार,
              कर रहे हुरदंग............... खेल रहे............. ।
गोपियों ने घेरे श्याम,
रंग दियौ तन तमाम।
बेकार सब रंग गये,
श्याम श्याम ही रहे।
उनके कारे अंग पै,
चढ़ौ न कोई रंग............... खेल रहे............. ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 


चित्र गूगल से साभार 


Tuesday, 22 March 2016

होली मिलने मिलाने का त्योहार है

होली मिलने मिलाने का त्योहार है,
हिल मिल कर मनाइये।
अपनों को ठुकराकर,
औरों को अपनाकर-
नहीं दिल उनका जलाइये...... होली मिलने......... ।

होली की धूम में,
मचता है हुरदंग।
उड़ते हैं अबीर गुलाल,
बरसते हैं रंग।
भंग में रंग, रंग में भंग पड़ने से बचाइये...... होली मिलने......... ।

हुरियारे का आप पर,
लग गया ठप्पा।
गाइये ठुमरी या गाइये टप्पा।
गुन गुनाइये मिलन की रागिनी,
नहीं बिहाग सुनाइये...... होली मिलने......... ।

ख़ुशी का दिन है नाचो और झूमो,
चाहे किसी के गले लगो चाहे जिसे चूमो।
उड़ाओ गुलाल,
करके रंगों की बरसात,
सबको सतरंगी बनाइये...... होली मिलने......... ।

खुला रख दर,
खुला रख दिल।
भूल कर गिले शिकवे,
आज सबसे मिल।
करिये न भेद भाव सबसे मिलिये मिलाइये...... होली मिलने......... ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा   



चित्र गूगल से साभार 
                 

Sunday, 6 March 2016

गाय महिमा

है गाय हमारी अस्मिता,
उसका धर्म-कर्म से नाता है।
नहीं गाय को पशु मानो,
वह हम सबकी माता है।
              माँ नहीं जिसको दूध पिला सकती है,
              वह गाय के दूध से पलता है।
              होने से पौष्टिक और सुपाच्य,
              बच्चे को समुचित बल मिलता है।
दिल दिमाग होता है दुरुस्त,
शरीर पुष्ट हो जाता है..........नहीं गाय को......................... ।
             पंच गव्य के प्रतिदिन प्रयोग से,
             जीवन में शुचिता आती है।
             मनुष्य स्थिर प्रज्ञ हो जाता है,
             मन की भटकन रुक जाती है।
वह सोचने लगता है भला-भला,
भद्र पुरुष कहलाता है..........नहीं गाय को........................... ।
             गाय के शरीर में है-
             कोटिश देवों का वास।
             उसकी सेवा से मिल जाता है,
             सब देवों का अनुग्रह अनायास।
अन्त समय जीव की मुक्ति को,
गौदान कराया जाता है..........नहीं गाय को...........................।
             गोवंश के संबर्धन को,
             गौ को संरक्षित करना होगा।
             उसकी सुरक्षा को उसको,
             राष्ट्रीय पशु घोषित करना होगा।
गाय की सेवा के कारण ही नन्द लाला,
गोपाला कहलाया जाता है..........नहीं गाय को........................... ।
                              
 जयन्ती प्रसाद शर्मा 



Friday, 26 February 2016

प्रवर बन्धु नमस्ते!

प्रवर बन्धु नमस्ते!
नहीं विसूरते देखा तुमको,
रहते हरदम हँसते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
नहीं दुखी करते क्या दुख तुमको,
शूल नहीं सालते क्या मन को।
कैसे सह लेते तन मन की पीड़ा,
इसका राज बताओ हमको।
दारुण दुख में भी नयन तुम्हारे,
देखे नहीं बरसते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
मैं नहीं पालता खुशफहमी,
मैं यथार्थ में जीता हूँ।
नहीं करता कोई कल्पना-
जहर को जहर समझकर पीता हूँ।
सुख-दुख नहीं करते उद्धेलित मुझको,
सहता हूँ समान समझते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
सुख औरों के नहीं करते-
मुझको दुखी
दुख औरों के नहीं करते-
मुझको सुखी।
मैं दायित्व निभाता हूँ-
मन से और हरषते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।
मैं नहीं सोचता भूत भविष्य की-
वर्तमान में रहता हूँ।
मैं नहीं सहेजता वर्षों को,
पलों की चिन्ता करता हूँ।
बनते दिन, महीने और साल पलों से,
भविष्य के खुल जाते हैं रस्ते.............. प्रवर बन्धु नमस्ते........।


जयन्ती प्रसाद शर्मा                   

Thursday, 11 February 2016

बसंत

आ गया बसंत मन भावना,
मौसम हुआ सुहावना।
फूल खिले हैं डाली डाली,
कूक रही कोयल मतवाली।
नाँच रहे मयूर होकर मगन, 
मनों में जगा रहे कामना............. आ गया बसंत........ ।
वातावरण में बढ़ गई खुशगवारियां,
हरित हो गई हैं क्यारियाँ।
महक गये हैं उपवन,
भवरों की गुंजन मिटा रही दुर्भावना......आ गया बसंत........ ।
जाड़े की जड़ता दूर हुई,
मनों की निराशा काफूर हुई।
पक्षियों का कलरव बना रहा, 
सुखद भविष्य की सम्भावना............. आ गया बसंत........ ।
फूल रही खेतों में सरसों,
साजन आ जायेंगे परसों।
खिली कली आशा की, 
लिख गई गोरी के मन में मिलन की प्रस्तावना............. आ गया बसंत....... ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 






Saturday, 30 January 2016

एक अन्वेषण

तुम्हारे कुशल प्रबंधन ने,
बना दिया है स्वर्ग- 
और तुमने इसकी प्रशस्ति भी पाई है।
मैं स्वर्ग वासी होना नहीं चाहता।
तुम नितांत पत्नी ही बनी रहीं,
मुझे भी बनाये रखा पतिदेव।
मुझे देवत्व स्वीकार्य नहीं है।
मैंने जब भी मिलाने चाहे नयन,
तुम अवनत ही देखती रहीं।
मैं तुम्हारी चंचल चितवन का आकांक्षी था।
तुमने भोगने दिया है अपने आप को-
बन्दिशों व हिदायतों के बीच।
मैं मुक्त साहचर्य का अभिलाषी था।
मैंने जब भी किया है प्रयत्न तुममें खोजने को प्रणयिनी,
तुमने कर दिया पहलू बदल कर विरोध-
और कठोर मन परिणयिनी ही बनी रहीं।
क्या यह मेरा दुराग्रह था?
मैंने तुम्हारे सर्द व्यवहार का नहीं किया मुखर विरोध-
बचने को लंपटता की लांछना से।
मैं पिसता रहा हूँ अपनी उन्मुक्त प्रेम की लालसा-
और तुम्हारी निर्लिप्तता के पाटों के बीच।
यह विडम्बना ही तो है।
आज जब खोज लिया गया है ईश्वरीय कण हिग्स बोसोन,
मेरा असफल अन्वेषण तुममें प्रीतिकण खोजने तक ही-
सीमित रहा है।
क्या मैं उपहास का पात्र नहीं बन गया हूँ?
जयन्ती प्रसाद शर्मा