Friday, 9 August 2019

हे वीर सैनिक तुमको नमन

सबकी अपनी अपनी ढपली,
अपना अपना राग।
किसी को सुहाता है सावन,
किसी को भाता फाग।
जब सब गाते कजरी-टप्पे,
वे गीत ओज के गाते हैं।
सीमा पर रहते मुस्तैद,
नहीं मौसम उन्हें डराते हैं।
वे रहते हैं सदा सजग,
कोई लगा न दे कभी आग।
न कोई उनको गर्मी,
न कोई उनको सर्दी।
न कोई उनकी इच्छा ,
न कोई उनकी मर्जी।
वे रहते हैं चौकन्ने,
खतरा होने पर गोली देते दाग।
जब मनाते सभी दिवाली,
वे खेलते खून की होली।
होता है वह वीर शहीद,
जिसको दुश्मन की लगती गोली।
पल भर में उसके घर में,
डेरा डाल देता दुहाग।
हे वीर बाहु तुमको नमन, 
हे सुबाहु तुमको नमन।
देश की रक्षा को दिये प्राण,
हे बलिदानी तुमको नमन।
युद्ध में रत रहे अंत तक,
नहीं पीठ दिखा कर आये भाग।

जयन्ती प्रसाद शर्मा 'दादू'

चित्र गूगल से साभार 

Sunday, 4 August 2019

सावन मनभावन

घिर घिर बदरा आबते, बिन बरसें उड़ जांय।
नीको जोर दिखावते ,पर बरसत हैं नायँ।
पर बरसत हैं नायँ ,दया नहि दिखलाते हैं।
गरजत चमकत खूब,नहीं जल बरसाते हैं।
रहते चलायमान ,बादल रहते नहीं थिर।
नहि होती बरसात, जलद आते हैं घिर घिर।

सावन सगुन मनाइये झूला झूलौ जाय, 
पैंग बढ़ाइ लेउ पकड़ बदरा उड़ नहि जाय।
बदरा उड़ नहि जाय  मेघ बरस पहले यहाँ ,
फिर चाहौ उड़ जाउ  या बरसौ चाहे जहाँ।
कह दादू कविराय जल बरसाते श्याम घन,
भले गये दिन आय  झूम कर आया सावन।
                       

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Monday, 29 July 2019

ये भी आये, वे भी आये

ये भी आये, वे भी आये,
सभी ही उनके,
जनाजे मे आये।
आये करीबी, आये रकीबी,
रोते थे बिसूरते थे सभी ही।
उनमें से कुछ थे,
मुखौटे लगाये।
कुछ थे देनदार,
कुछ थे लेनदार।
संग वे अपने,
बही खाते भी लाये।
कुछ आये थे निभाने को फ़र्ज,
नहीं थे उनके रसूखों में दर्ज।
वे सिर्फ इंसानियत,
दिखाने को आये।
कुछ थे दबंग कुछ थे धाँसू,
बहाते थे दिखाने को घड़ियाली आँसू।
देख कर पयाम उनका,
कोरों में मुस्कराये।
जयन्ती प्रसाद शर्मा 

Saturday, 20 July 2019

घड़ियां इंतज़ार की

घड़ियां इंतज़ार की
लगती हैं पहाड़ सी
पलकें होती हैं बोझिल
आँखें सुर्खरू
जैसे तप्त हों बुखार से।
मनहो जाता है व्याकुल
और तन आकुल
हर आहट पर चौंक उठती है
आ गये सनम।
आवारा बयार का झौंका होगा
अथवा कोई श्वान
खड़का गया दरवाजे के
किवाड़।
न देख कर प्रिय को हुई मायूस
खो गया दिल का चैन
बढ़ गई बेकरारी
पड़ गई हो कर निढाल।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Monday, 15 July 2019

भोर भई अब जागो लाल!

भोर भई अब जागो लाल!
मुँह उठाय रँभाइ रही गैया,
बाट देखि रहे ग्वाल।
उदय भये रवि किरण पसारीं,
अम्बर से उतराईं।
चूँ चूँ करती चुगने दाना,
चिड़ियाँ आँगन में आईं।
काहे लाला अब तक  सोवै,
है रहे सब बेहाल।
उठो लाल मुँह हाथ पखारो,
मैं लोटा भर जल लाई।
नित्य कर्म कर बंशीवट जाओ,
प्यारे कृष्ण कन्हाई।
कर कर जतन जगाइ रही मैया,
जागत नहिं नँद लाल।
गावते प्रभाती चले बटोही,
पहुँच गये कई कोस।
प्रखर भई सूर्य की किरणें,
विगलाइ गई है ओस।
कबहू शीश पै हाथ फिरावै,
कबहू चूमती भाल।
देखो कान्हा द्वारे जाय कें,
राधा तुम्हें बुलावै।
अगर रूंठ कर लौट गई वो,
फेरि बगदि नहिं आवै।
भड़भड़ाइ उठि बैठे मोहन,
समझी मैया की चाल।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Thursday, 4 July 2019

दहक रहे नफरत के अंगारे

लगता है सर्वत्र आग लगी है,
दहक रहे नफरत के अंगारे।
लाल भभूका हैं सबके मुख,
आरक्त हुऐ गुस्से के मारे।
सूख गये हैं नेह कूप,
जुल्म ढा रही ईर्ष्या की धूप।
दिखता नहीं कहीँ सौहार्द,
जायँ कहाँ अपनों से हारे।
अपनों का चुक गया अपनापन,
रहने लगी सम्बन्धों में अनबन।
गला काटते अपने ही अपनों का,
दुश्मन बन गये प्राणों के प्यार।
देख किसी का उत्कर्ष हाथ मलते हैं,
स्वयं नहीं कुछ कर पाते लेकिन ईर्ष्या करते हैं।
बिना बात करते हैं नफरत,
जिनके उजले तन हैं पर मन काले।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Thursday, 13 June 2019

जीवन है संग्राम

बन्धु रे जीवन है संग्राम,
निज अस्तित्व बचाने को,
लड़ना पड़ता है आठौ याम।
 कभी समाज से कभी सिद्धांत से,
कभी अपने मन की उद्भ्रान्ति से।
बीत जाता है जीवन लड़ते लड़ते,
मिलता नहीं मुकाम।
कुछ स्वस्ति वाचक समाज में,
पा जाते हैं शीर्ष ठौर ।
लेकर सहारा जाति पाँति का,
बन जाते हैं सिर मौर।
वे ही संचालन करते हैं समाज का,
पाते हैं धन और नाम।
सोच है उनकी होंगे बदनाम-
पर नाम तो होगा।
नही हो भला देश समाज का,
उनका तो होगा ।
अनाम मरने से अच्छा है,
मरना होकर बदनाम।
ऐसी मानसिकता से समाज,
कैसे उन्नति पायेगा ।
अवनत समाज के होने से,
क्या देश शीर्ष पर जाएगा ?
संसद में होती है टाँग खिंचाई,
देश की धूमिल होती है छवि अभिराम।
जयन्ती प्रसाद शर्मा