Saturday, 16 November 2019

नदिया चंचल

नदिया चंचल,
न हो उच्छृंखल।
कल-कल करती नाद,
धीरे बहो।
सँभालो अपना वेग,
न दिखे लहरों में उद्वेग।
रख नियंत्रण संवेगों पर,
तीरे बहो।
वेगवती तुम नहीं इतराना,
बहुत दूर तक तुमको जाना।
करना है तय लम्बा सफर,
हद में, सुनीरे रहो।
असंयमित हो नहीं तोड़ना कगार,
बिगड़ेगा रूप आयेगी बाढ़।
बह जायेंगे समृद्धि-संस्कृति-संस्कार,
न हो उद्वेलित, धीरे रहो।
जयंती प्रसाद शर्मा

Saturday, 9 November 2019

मन की भटकन

मन की भटकन से उसका हर बार निशाना ऊक रहा है,
स्थिर प्रज्ञ नहीं होने से वह लक्ष्य से चूक रहा है।
जानता है उसका थूका उस पर ही गिरेगा,
फिर भी मुँह ऊपर कर थूक रहा है।
कोई नहीं मनायेगा उसको,
फिर भी पगला रूठ रहा है।
तोड़ता रहा है वह औरों के घर,
अब उसका भी घर टूट रहा है।
गाहे बगाहे करता रहा है लूट,
उसका साथी ही उसको लूट रहा है।
दर बदर करता रहा है वह लोगों को,
अब उसका भी दर छूट रहा है।
वह समझ गया है सदा नहीं रहती दबंगई,
ठिकाना अपने छिपने को ढूँढ रहा है।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Friday, 1 November 2019

तेरी यादों के शूल

लाख रोकने पर भी निकल जाती है आह,
जब चुभते हैं तेरी यादों के शूल।

तेरी बेवफ़ाई ने करा दिया है अहसास,
वह प्यार न था सिर्फ़ शिगूफ़ा था।

तेरी याद में रो लेते थे,
आँसुओं संग निकल जाता था गुबार।
अब दिल में ही घुमड़ता रहता है।

तेरी बेरुख़ी से भी मिलता है सुकून,
चलो तूने इस क़ाबिल तो समझा।

इल्तिजा है न मुझे देखना उस तरह से,
मैं सह न सकूँगा ताव और मर जाऊँगा।
जयन्ती प्रसाद शर्मा, दादू 

Saturday, 26 October 2019

ब्रज धाम

अति पावन माँटी है ब्रज की,
तिलक लगाऔ समझि कें चन्दन।
श्रद्धा सौं भैंटहु ब्रजवासिन,
करत रहे केलि इन सँग नँद नंदन।

गैया पूज्य हैं जमुना पूज्य है,
पूज्य है सिगरी ब्रज भूमी।
यहाँ धेनु चरावत घूमे कान्हा,
उन सँग राधा हू घूमी।

अति पवित्र है धाम वृन्दावन,
यहाँ रास रचाते रहे कन्हैया।
ग्वाल-बाल सँग धेनु चराते,
वेणु बजाते कदंब की छैयाँ।

बड़े भाग हैं उन जन के,
जिन दर्शन ब्रज धाम कौ कीन्हौं।
मानुष हैवे कौ फल पायौ,
जनम सफल अपनौं करि लीन्हौं।
जयन्ती प्रसाद शर्मा



Friday, 18 October 2019

खुशियों के पल

चाँद-चाँदनी की अनुपस्थिति में,
तारे खिलखिला रहे हैं।
कभी कभी अमावस भी होनी चाहिये।

बिलों से निकल कर चूहे-
कर रहे हैं धमाचौकड़ी।
आज पूसी मौंसी घर पर नहीं है,
आओ कुछ देर हँसलें खेल लें।

मित्रो, आज बॉस नहीं हैं,
चलो रमी खेल लेते हैं।

आज अवकाश है।
भूल कर चिंता फिकर-
पिकनिक पर चलें।

इस दुर्गंधमय वातावरण में,
अय गुलाब तू क्यों महक रहा है।
चल समेट ले अपनी गंध,
तुझे यहाँ कौन रहने देगा।

छोटी छोटी खुशियों के पलों में-
चहक लेते हैं।
क्या पता ये भी फिर,
मिलें न मिलें।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 12 October 2019

प्यार की प्यास,

सबको प्यार की प्यास,
मुझको भी प्यार की प्यास।
दूर दूर सब रहते मुझसे,
पड़ा अकेला बातें करता खुद से।
रहूँ बुलाता इसको-उसको,
कोई नहीं आता पास।
लगता है अब जाने की हुई उमर,
मैं उपेक्षित हुआ बदली लोगों की नजर।
अपनों के बेगानेपन से,
टूटी जीवन की आस।
मैं चाहता हूँ कोई मुझसे प्यार करे,
हँस करके बातें दो चार करे।
कन्नी काट निकल जाते हैं,
मेरे खासम ख़ास।
मैं क्यों जीवन का उत्सर्ग करूं,
क्यों नहीं अपने अतीत पर गर्व करूँ।
मेरी गर्वोक्त का मजाक बना कर,
उड़ाते लोग उपहास।
जयंती प्रसाद शर्मा

Saturday, 5 October 2019

माँ की महिमा अपरम्पार

बंधु मेरे नवरातों में,
जागा करिये रातों में।
माँ की भक्ति में रम जाओ,
जाया करिये जगरातों में।

माँ की महिमा अपरम्पार,
करती भक्तों का बेड़ा पार।
बिन माँगे सब कुछ पाओगे,
जाकर देखो उसके द्वार।

माँ का भव्य सजा दरबार,
करिये दर्शन, करिये जयकार।
माता तुमको बुला रही है,
राह तुम्हारी रही निहार।

भक्तो माँ से लगन लगाओ,
भक्ति में उसकी तुम रम जाओ।
जय माता दी कहते कहते,
मंदिर की सीढ़ी चढ़ते जाओ।

जयन्ती प्रसाद शर्मा