Friday, 17 April 2020

समय की फिक्र

जिसको चलने का जनून है,
वह चलेगा।
न मिले मंज़िले मकसूद,
कोई तो मुकाम मिलेगा।
जो पल्लवित हुई है डाली,
उस पर पुष्प खिलेगा।
जो जमा हुआ है आज,
कल को वह गलेगा।
सुबह का निकला सूर्य,
शाम को ढलेगा।
चाँद सितारे भी हैं चमकने का,
उनको भी वक्त मिलेगा।
जो नहीं करते समय की फ़िक्र,
समय उन्हें छलेगा।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 11 April 2020

अब क्या रोना

अब क्या रोना,
होगा वही जो है होना।
नहीं माने बहुतेरा समझाया,
किया वही मन में जो आया।
नहीं माने लोगों से लिपटे,
तुमसे अब लिपटा कोरोना।
रखी नहीं सामाजिक दूरी,
चलाई स्वयं के गलों पर छूरी।
बहुत जरूरी था बचने को,
बार बार हाथ धोना।
नहीं रहे घरों में बंद किया भ्रमण,
बेलाग मिले लोगों से हुआ संक्रमण।
जान के पड़े हैं लाले,
आइसोलेशन में रहोना।
माने नहीं निर्देश लिया मज़ा,
झेलो महामारी की मार भुगतो सजा।
जीवन होगा शेष बचोगे,
मन में धीर धरोना।

जयन्ती प्रसाद शर्मा,दादू ।

Tuesday, 7 April 2020

बजरंगी हनुमान

बजरंगी हनुमान,
अतुलित शक्ति अपरिमित ज्ञान।
तुमको जो ध्याता,
तुमसे लगन लगाता।
वह पाता है,
अनायास धन मान।
तुम्हारे संग का सत्व,
पाया राम ने रामत्व।
श्रीहीन किया दशकंधर,
न था जिसके वैभव का अनुमान।
लांघा समुद्र,
जैसे नाला हो छुद्र।
जला दी लंका,
तृणवत मान।
हे बजरंग अष्ट सिद्धि प्रदाता,
हे कपीश नव निधि के दाता। 
मुझको अपनी देउ भक्ति,
हे प्रभु कृपा निधान।
जयन्ती प्रसाद शर्मा



Wednesday, 1 April 2020

करोना को हराना है

करोना गंभीर अति जानो यह श्रीमान,
लापरवाही आपकी ले ही लेगी जान।
ले ही लेगी जान न कमतर इसको आँको,
रहो घरों में बंद निकट भूले नहिं झाँको।
संक्रमितों से बचें न उनसे हाथ मिलाना,
रख सोशल डिस्टेंस हराना है करोना।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Friday, 27 March 2020

कोरोना!

अवांछित है अनामंत्रित है,
सड़कों पर स्वागत नहीं करोना।
नहि भेटहु नहि गहो हाथ,
दूर ही रहोना।
मानव रक्त का प्यासा है,
सामने पड़ोना।
न घुस सके घरों में बलात,
द्वार बंद रखोना।
रक्तबीज सा है दुर्दमन,
इसकी दृष्टि से बचोना।
बचने को इसके दुष्प्रभाव से,
एकांत वास करोना।
संक्रमितों से बचाव एकमेव उपाय,
न काम करेगा टोना या दिठोना।
जयन्ती प्रसाद शर्मा,दादू ।

Saturday, 21 March 2020

विचारों की जुगाली

पड़ा पड़ा खाम खयाली में
करता रहा विचारों की जुगाली मैं
न उठी कोई लहर 
न बनी कोई बहर
मैं हार थक कर
सो गया मुँह ढक कर

नहीं पड़ा मन में चैन
मैं बहुत रहा बेचैन
किया बड़ा जोड़ तोड़
करी शब्दों की तोड़ फोड़
स्वयं को बहुत हिलाया डुलाया
रह कर मौन, जोर से चिल्लाया।

फिर भी न हुआ कुछ हासिल
मेरा श्रम हुआ फाजिल
अपने न कुछ होने की हुई चिंता
अवसाद ग्रस्त हुआ मन, बढ़ी कुंठा
मैं बहुत शर्मिंदा हुआ
चुल्लू भर पानी में डूबने को मन हुआ।

होने पर अपने हामिला होने का भ्रम
बाँझ करती है अनेक उपक्रम
उदर में लेती है हिलोर
जननांग पर देती है जोर
नहीं होना होता है नहीं होता सृजन
मैं छद्म कवि मार कर बैठ जाता हूँ मन।
जयन्ती प्रसाद शर्मा, दादू।

Sunday, 15 March 2020

एक कतरा आँसू

एक कतरा आँसू टपक गया है,
नहीं चाहते हुए भी वह फफक गया है।
जतन से छिपाये रखा था उसने ग़मे-दिल,
उसकी नादानी से चमक गया है।
आते ही ज़ेहन में ख़याल उसका,
वह बिना पिये ही बहक गया है।
देख कर उसको अपनी गली में,
वह गुलाब  सा महक गया है।
होते ही दीदार सनम का,
वह पंछी सा चहक गया है।
उसकी नज़रों की तल्ख़ी से,
वह सलीब पर लटक गया है।
बेरुख़ी का पत्थर लगते ही,
नादाँ दिल शीशे सा चटक गया गया है।

जयन्ती प्रसाद शर्मा, दादू ।