Monday, 24 December 2018

हाइकु

सदुपयोग
करो अवसरों का
फल मिलेगा।

रहो सजग
नहीं हो अपकर्म
सुखी रहोगे।

भाई साहब
आप न हों उदास
रखें धीरज।

मिलेगा चीता
उचित अवसर
जब आयेगा।

रखें भरोसा
हो सकती है देर
नहीं अंधेर।

नंद के छैया
सबकी सुनते है
वंशी बजैया।

पाओगे पार
दुखों के झंझावात
मिट जायेंगे।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

Friday, 14 December 2018

वह समझ न सकी

वह समझ न सकी वह समझा न सका,
बीत गई उम्र समझते समझाने में।
कुछ ऐसे तल्ख हुये रिश्ते,
वह अब बैठा करते हैं मयखाने में।
           खेल-खेल में ले लिया दर्द,
           अब झेले नहीं झिलता है।
           वे हो गये हैं बेदर्द और रूखे,
           नहीं उनकी फितरत से चैन मिलता है।
नहीं चल सकोगे साथ मेरे,
कह कर दिल उन्होंने तोड़ दिया,
पर मैं हो नहीं सका उनसे जुदा,
उनकी यादों से खुद को जोड़ लिया।
            थोड़ी सी मुझे पिला दे साकी,
            तौर ए मुहब्बत सिखला दे।
            कैसे हो जाता है प्यार किसी से,
            यह राज मुझे भी बतला दे।
उनकी बेरुखी से दिल मेरा जला कोई बात नहीं,
चमक से उसकी कई घर रोशन हो गये है।
कई दिनों से ठंडे पड़े चूल्हे,
उसकी तपिश से गर्म हो गये हैं।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Saturday, 1 December 2018

शमा रातभर जलती रही

शमा रातभर जलती रही,
पिघलती रही।
खोती रही अपना अस्तित्व,
मिटाने को तमस।
उसकी सदेच्छा,
न भटके कोई अँधेरे में।
न होये अधीर,
घबड़ा कर निबिड़ अन्धकार से।
उसके परोपकारी भाव का,
नहीं दिया किसी ने सिला।
नहीं गाया किसी ने प्रशस्ति गीत,
उसके उत्सर्ग  का।
पतंगा, सृष्टि का क्षुद्र जीव,
न सह सका आभारहीनता।
वह हो गया उद्यत बचाने को,
शमा का अस्तित्व।
वह दीवानगी की हद से गुजरता रहा,
बुझाने को शमा उसकी लौ में जलता रहा।
पतंगों की लाशों का लग गया ढेर,
शमा वैसे ही निर्विकार जलती  रही।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

Sunday, 25 November 2018

हाइकु

मेरा भारत
अनेक भाषाभाषी
रहते यहां।

पालते धर्म
बिना भेदभाव के
करते कर्म।

हवा सबकी
आसमान सबका
जमीं सबकी।

झंडा उठाओ
'जय भारत माता'
नारे लगाओ।

करो न शक
हैं सब देशभक्त
नहीं संदेह।

करो प्रयास
दल दल दलों का
हो जाये साफ।

साफ कर दो
कूड़ा राजनीति का
अभियान से।

साकार करो
सपना भारत का
हो विश्वगुरु।


जयन्ती प्रसाद शर्मा




Saturday, 17 November 2018

हम नहीं थे इनके

हम नहीं थे इनके नहीं थे उनके,
सबके ही हम खास रहे।
नहीं किसी से दूर रहे,
सबके ही हम पास  रहे।
जो मिला उसे अपना समझा,
जो नहीं मिला उसे सपना समझा।
रूठे अपने टूटे सपने,
नहीं रोये नहीं उदास रहे।
चूमना चाहते थे हम गगन,
छू भी न सके पर रहे मगन।
नहीं विफलता से हुए विकल,
असफलता से नहीं निराश रहे।
झेले जीवन में झंझावात,
करने पड़ जाते थे उपवास।
नहीं घबड़ाये नहीं बिल्लाये,
नहीं हालातों के दास रहे।
नहीं समेटने की रही भावना,
नहीं घर भरने की रही कामना।
सारा जहाँ हमारा था,
सर्वे भवन्तु सुखिन को करते हम प्रयास रहे।

जयन्ती प्रसाद शर्मा


Friday, 9 November 2018

बोलौ गोरी रहिहौं कित में,

बोलौ गोरी रहिहौं कित में,
कै काहू के आईं पाहुने,
देखी नहीं कबहू इत में।
मैं सब बीथिन में आवत जावत, 
घूमूँ वनखड़ में गऊ चरावत।
सिगरौ वृज मेरौ देखौ भालौ,
तुम दिखीं नहीं कबहू उत में।
कै तुम आईं नंद बवा के,
सर्वाधिक गउएँ खरिक में जाके।
कै तुम भूलि गयी हौ पथ,
चैन नहीं चित में।
बोलौ मैं का कर्म करूं,
तुम्हें कहाँ बिठाऊँ कहाँ धरूं।
छोड़ शर्म कहौ करिबे कूँ,
जो हो कर्म तुम्हारे हित में।
जयन्ती प्रसाद शर्मा






Monday, 5 November 2018

गांधीगीरी

अपनी नेतागीरी चमकाने को,
दबंग को गांधीगीरी दिखाने को।
वे पहुँच गये लेकर गुलाब के फूल,
पर वह नहीं हुआ अनुकूल।
फेंक दिये उसने नोंचकर फूल-
और चटा दी उनको धूल।
हाथ-पैर तुड़ाकर,
सिर फुटौबल करा कर।
चारपाई पर पड़े पड़े कराह रहे हैं,
गांधीगीरी ईजाद करने वालों को-
गालियाँ सुना रहे हैं। 

जयन्ती प्रसाद शर्मा